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भक्ति से मुक्ति

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 भक्ति से मुक्ति Image by Capri23auto from Pixabay गुरु गोविन्द सिंह जी अपने शिष्यों के साथ जंगल के रास्ते से कहीं जा रहे थे तो रास्ते में एक बहुत बड़ा अजगर पड़ा था और उसे बहुत सी चींटियाँ खा रही थी। अजगर की आँखों से आँसू गिर रहे थे पर वह वैसे ही पड़ा हुआ था। गुरु गोविन्द सिंह जी लांघ कर आगे चले गए। पर शिष्य हैरानी से यह दृश्य देखने लगे। उन्होंने गुरु जी से पूछा - गुरु जी! इसके पीछे क्या कारण है ? इतना बड़ा अजगर और ये नन्हीं-नन्हीं चीटियाँ! यह उन से अपनी रक्षा क्यों नहीं कर पा रहा ? गुरु गोविन्द सिंह जी ने कहा - ये इसके कर्मों का फल है। शिष्य - गुरुवर! ये कौन से कर्म का फल है ? गुरुवर - इसे जब मानव जन्म मिला था तो यह एक ढोंगी गुरु की पदवी पर बैठ गया था और ये जो चीटियाँ हैं, ये सब इसके शिष्य थे। इस अजगर के जीव ने मानव तन में खुद तो ईश्वर को जाना नहीं और इन आत्माओं को भी ईश्वर की तरफ जाने से रोक कर अपने से जोड़ लिया। यह खुद तो अधोगति में गया और इन्हें भी अधोगति में ले आया। अब ये इससे हर जन्म में ऐसे ही हिसाब पूरा करेंगी। यही कर्मों का खेल है। शिष्य - हे गुरुवर! इनकी मुक्...

वो अजनबी

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 वो अजनबी Image by Christel SAGNIEZ from Pixabay दिसंबर की सर्द रात, कोहरा भी काफी था। ऐसे मे सुधा को रात 8:30 की ट्रेन पकड़नी थी वापस घर जाने को। यहां वह अपने मम्मी पापा से मिलने आई थी और पति मोहन ऑफिस की व्यस्तता के चलते उसके साथ नहीं आए थे। खैर... इससे पहले भी वह अकेले सफर कर चुकी थी मगर उस रात कुछ ज्यादा ही कोहरा छाया था। स्टेशन पहुंची तो पता चला कि उसकी ट्रेन पांच घंटे लेट है। मां अकेली थी सो पिताजी को वापस भेज दिया मगर मन में डर था। अब अकेले स्टेशन पर वह कैसे पांच घंटे बिताएगी। टिकट ए.सी. कोच का था सो वो वेटिंग रूम में पहुंची मगर वहां सिर्फ दो पुरुष थे। वह भय के कारण गेट के पास वाली बेंच पर बैठ गई। कुछ देर में उन दो पुरुष यात्रियों में से एक उठकर चला गया। शायद उसकी ट्रेन आ गई थी। अब उस कमरे में केवल सुधा और वह अजनबी पुरुष था। मगर वह अजनबी चुपचाप अखबार को धीमी रोशनी में पढ़ने की कोशिश कर रहा था। अभी कुछ देर ही बीती थी कि बाहर से कुछ लोगों की आवाजें आने लगी। शायद उनकी भी ट्रेन लेट थी। लेकिन वे जब अंदर आए तो उनके साथ शराब की बदबू भी आनी शुरू हो गई। सुधा को अब कुछ...

देना ही लेना

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 देना ही लेना Image by fred prose from Pixabay एक राजा के राज्य में एक फ़कीर रहता था। राजा का रोज़ाना का नियम था कि सुबह 9:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक अपने खज़ाने से ग़रीबों व भिख़ारियों को दान किया करता था अर्थात खज़ाना, पैसा आदि बांटा करता था। जिससे उस राजा को बहुत खुशी मिलती थी। एक फ़कीर रोज़ आता था और लाइन में लग जाता था। जो भी उससे पहले खड़े होते थे या उसके बाद जो और लोग आते थे, वह अपनी बारी, और लोगों को देता रहता था। धीरे-धीरे शाम के 5:00 बज जाते थे और फकीर का नंबर नहीं आता था। धीरे-धीरे कई दिन बीत चुके थे। ऐसा ही रोज़ाना होता था। फकीर अपनी बारी दूसरों को देता रहता था और शाम 5:00 बजे तक उसको दान नहीं मिलता था। यह क्रिया राजा का एक दरबारी देखता रहता था और नोट करता रहता था। उसने यह सारी बात राजा को बताई। राजा ने भी गौर किया। उसके बाद राजा ने उस फकीर को बुलाया और उस फकीर महाशय से पूछा - महाशय! तुम रोज़ हमसे दान लेने के लिए आते हो लेकिन रोज़ाना खाली हाथ लौट जाते हो। तुम लोगों को अपने से आगे करते रहते हो और अपना नंबर दूसरों को देते रहते हो। फकीर ने कहा - राजा जी! आप राजा हो...

सिपाही धनपतराय

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 सिपाही धनपतराय Image by _Alicja_ from Pixabay मलूकपुर थाने में एक रोशनलाल नाम का सिपाही हुआ करता था। वह अपनी बहादुरी, साहस और ईमानदारी के लिए पूरे थाने में ही क्या, बल्कि पूरे थाना क्षेत्र में प्रसिद्ध था। अब वह रिटायर होकर अपने घर पर ही रहा करता था। रिटायर हुए उसे अभी केवल 4 साल ही हुए थे। उसकी आयु 60 वर्ष से अधिक थी। उसके परिवार में उसके दो बेटे, एक बेटी और उसकी पत्नी थी। उसके दोनों बेटों की शादियां हो चुकी थी। अब उनके 2-2 छोटे-छोटे बच्चे थे। रोशनलाल के पौत्र स्कूल जाते और वहां से आकर अपने दादाजी से लिपटकर नाना प्रकार की जिद्द किया करते थे। एक दिन जाड़े के मौसम में उन्होंने अपने दादाजी को घेर लिया। रात के समय सब लोग लिहाफ ओढे़ अपनी चारपाई पर लेटे थे। रोशनलाल बच्चों के लिए मूंगफली लाए थे, बच्चे खुशी-खुशी मूंगफली खा रहे थे और दादा से कोई कहानी सुनाने की जिद्द कर रह थे। काफ़ी देर तक जिद्द करने के बाद रोशनलाल जी ने कहानी सुनाने के लिए ‘हां’ कर ली। फिर सब बच्चे खामोश होकर दादा जी के चेहरे की ओर देखने लगे। “सुनो बच्चों! मैं अपने जीवन के उन दिनों का किस्सा सुना रहा हू...

बंद मुट्ठी खुली मुट्ठी

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👼👼💧💧👼💧💧👼👼 बंद मुट्ठी खुली मुट्ठी Image by Mariya 🌸🥀🌻🎋🌷🌹💐🌼 from Pixabay एक आदमी के दो पुत्र थे राम और श्याम। दोनों थे तो सगे भाई पर एक दूसरे के बिलकुल विपरीत। जहाँ राम बहुत कंजूस था वहीं श्याम को फिजूलखर्ची की आदत थी। दोनों की पत्नियां भी उनकी इस आदत से परेशान थी। घरवालों ने दोनों को समझाने के बहुत प्रयास किये पर न राम अपनी कंजूसी छोड़ता और न ही श्याम अपनी फिजूलखर्ची से बाज आता। एक बार गाँव के करीब ही एक सिद्ध महात्मा का आगमन हुआ। वृद्ध पिता ने सोचा - क्यों न उन्हीं से इस समस्या का समाधान पूछा जाए और अगले ही दिन वे महात्मा जी के पास पहुंचे। महात्मा जी ने ध्यानपूर्वक उनकी बातें सुनी और अगले दिन दोनों पुत्रों को लेकर आने को कहा। पिताजी तय समय पर पुत्रों को लेकर पहुँच गए। महात्मा जी ने पुत्रों के सामने अपनी बंद मुट्ठियां घुमाते हुए कहा, “बताओ यदि मेरा हाथ हमेशा के लिए ऐसा ही हो जाए तो कैसा लगेगा ? ” पुत्र बोले, “ऐसे में तो यह लगेगा, जैसे कि आपको कोढ़ हो।” “अच्छा! अगर मेरे हाथ हमेशा के लिए ऐसे हो जाएं तो कैसा लगेगा ? ” महात्मा जी ने अपनी फैली हथेलियाँ दिखाते हुए पूछा। “जी!...