खुशी में वृद्धि कैसे की जाए?

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Tips of Happiness

जानें कुछ व्यवहारिक सूत्र (11)

खुशी में वृद्धि कैसे की जाए?

खुशी को प्राप्त करने के बाद वह अपनी ज़रा-सी झलक दिखा कर लोप हो जाती है। हम ऐसा क्या करें कि उसमें वृद्धि हो जाए और वह अधिक समय तक हमारे साथ बनी रहे? खुशी को स्थायी कैसे बनाया जाए? 

हमारे मन में यह दुविधा हो सकती है कि जन्म-जन्मांतरों से ये क्रोध, मान, माया और लोभ की दुष्प्रवृत्तियां मन में डेरा जमाए बैठी हैं और हिंसा, झूठ, चोरी आदि हमारे स्वभाव का ही एक अंग बन चुकी हैं, हम इनको अपने दैनिक जीवन से अलग कैसे कर सकते हैं? 

पर हमें यह भी सोचना होगा कि काम अधिक है और समय कम है। छोटी-सी ज़िन्दगी का एक-एक पल कीमती है।

संत कहते हैं कि आपको किसी परीक्षा में 3 घंटे का समय दिया जाता है और बीच-बीच में परीक्षक चेतावनी भी देता रहता है - एक घंटा बीत चुका है या half the time is over या 10 minutes are left. इसका अर्थ यह नहीं है कि वह आपको डरा रहा है कि अपना काम जैसे-तैसे भी हो, जल्दी खत्म करो; बल्कि इसका मतलब यह है कि समय कम है, Time management करो। आवश्यक व आसान प्रश्नों को पहले हल कर लो ताकि कम समय में भी अधिक-से-अधिक लाभ ले सको। उस समय हमें स्वयं सोचना है कि आसान होने के साथ-साथ आवश्यक काम कौन-सा है? 

जीवन में खुशी आवश्यक है या दुःखी और बीमार बने रह कर, ओरों को कोसते हुए जीवन बिताने में जीवन की सार्थकता है।

अच्छे जीवन की सफलता को उसकी लम्बाई से नहीं अपितु उसकी गहराई से मापा जाता है।

कवि ने कहा भी है -

गतिशील करो कदमों को, मंज़िल पास नहीं है।

कालचक्र गतिमान, किसी का दास नहीं है। 

जीवन की इन सांसों को, सार्थक कर डालो।

सांसों का तो पल भर भी, विश्वास नहीं है।

खुशी एक प्रकार की Echo Sound की तरह है। जितनी बांटेंगे, उतनी ही यह बढ़ती जाएगी।

Echo Sound एक बार बोलने से तीन बार लौट कर वापिस आती है।

अपने दुःख बाँटने से कम नहीं होते बल्कि एक प्रकार से हम दुःखों की खेती कर रहे हैं, जिसका एक बीज सौ गुणा होकर हमारे पास आने वाला है। आपने देखा होगा कि जब हम अपना एक दुःख किसी के सामने बताते हैं तो वह अपने 10 दुःख हमें गिना देता है क्योंकि गिनाने के लिए सुख की बातें तो किसी के पास हैं नहीं और हम अपने दुःखों को कम करने के स्थान पर उसके दुःखों का बोझ लेकर स्वयं को और अधिक दुःखी कर लेते हैं।

इसके विपरीत यदि हम सुख बाँटने निकलते हैं तो सामने वाले के उदास चेहरे पर भी खुशी की लहर दौड़ने लगती है और वह अपना दुःख भूल जाता है।

हमें अपने पुण्य से जो खुशी या सुख मिले हैं, उसके तीन भाग करो। एक भाग स्वयं के लिए रखो, दूसरा भाग अपने आराध्य देव को समर्पित करो जिनके आशीर्वाद से हमें यह सुख मिला और तीसरा भाग उन पुण्यहीन प्राणियों में बाँट दो जो अभाव का जीवन व्यतीत कर रहे हैं ताकि वे भी अपनी दुआओं के प्रभाव से संसार में सुख की खेती करें। दीन-दुःखी का अभिशाप भी संसार के लिए कम दुःखदायी नहीं होता।

जैसे मंज़िल मापने से नहीं, चलने से मिलती है; वैसे ही खुशियाँ छीनने से नहीं, दूसरों को बाँटने से मिलती है।

एक प्रोफैसर साहब थे, बहुत खुशमिज़ाज़, शालीन व्यक्तित्व के धनी। Hostel में विद्यार्थियों के साथ ही रहते थे। जब उनके साथ घूमने जाते तो वहाँ भी प्रकृति के माध्यम से बच्चों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते और एक आदर्श नागरिक बनने की प्रेरणा देते रहते थे। 

एक बार रास्ते में सड़क के किनारे बच्चों को किसी व्यक्ति के एक जोड़ी जूते पड़े हुए दिखाई दिए। ऐसा लगता था कि जैसे कोई पास के खेत में काम करने के लिए अपने जूते उतार कर गया है। बच्चों के मन में शरारत सूझी। उन्होंने उन जूतों को छिपाने की योजना बनाई ताकि वह आदमी अपने जूतों की खोज में परेशान होकर इधर-उधर दौड़-भाग करे और बच्चे उसका मज़ा लें। 

प्रोफैसर साहब को उनकी योजना की भनक लग गई। किसी को बिना बात परेशान करना उनके आदर्शों के विरुद्ध था।

उन्होंने बच्चों से कहा कि अच्छा! तो तुम मज़ा लेना चाहते हो। मैं तुम्हें एक बहुत अच्छी योजना बताता हूँ। लगता है कि ये किसी मज़दूर के जूते हैं। लो, ये 100-100 रुपए के दो नोट और दोनों जूतों में छिपा कर रख दो। तुम सब पेड़ के पीछे छिप कर मज़ा लो और देखो कि क्या होता है?

बच्चों ने ऐसा ही किया। 

जब वह आदमी आकर अपने जूते पहनने लगा तो उसे जूते में कुछ कागज़ का स्पर्श हुआ। उसने जूतों को हाथ में उठाकर उनमें देखा तो 100-100 रुपए के दो नोट दिखाई दिए। उसने सोचा कि किसी ने उस ग़रीब के साथ कोई मज़ाक किया है। आस-पास देखा तो कोई भी नज़र नहीं आया। 

उसने तुरन्त हाथ ऊपर किए और भगवान का धन्यवाद किया कि हे भगवान! आज मालूम हुआ कि आप हमारे मन की बात कैसे जान लेते हो? आप वास्तव में अन्तर्यामी हैं। मुझे पत्नी की दवाई के लिए पैसों की बहुत ज़रूरत थी। जिसने ये पैसे रख कर मेरी मदद की है, भगवान उसकी झोली भी खुशियों से भर दे। 

ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पर खुशी के भाव थे जो दुगुने होकर पेड़ के पीछे छिप कर मज़ा ले रहे बच्चों के चेहरे पर भी दिखाई दे रहे थे।

प्रोफैसर ने कहा - देखा तुमने! सच्ची खुशी छीनने से नहीं, बाँटने से मिलती है।

मिठाई खाने मे उतना आनन्द नहीं आता, जितना किसी के आँसू पोंछने में आता है।

इसलिए खुशियाँ बाँटो और खुशियाँ पाओ। सच्ची खुशी धन से नहीं, मन से मिलती है।

--

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

 

Comments

  1. Too good article. Please keep posting

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  2. सही है खुशी बाटने से ही,खुशी मिलती है

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  3. नैतिक मूल्यों पर आधारित प्रेरक कहानी।

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    1. आज इन नैतिक मूल्यों की बहुत आवश्यकता है। आपकी प्रेरणा व स्नेह के लिए बहुत-बहुत आभार

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