स्वयं को क्रोध से कैसे बचाएं?
👼👼👼👼👼👼👼👼👼👼
Tips of Happiness
जानें कुछ व्यवहारिक सूत्र (7)
यदि हम स्वयं को खुश रखना चाहते हैं तो अपने मन को दुष्प्रवृत्तियों से बचा कर सद्व्यवहार में लगाना होगा। क्रोध, मान, माया और लोभ दीमक की तरह हमारी खुशी को खोखला कर देते हैं। ये अदृश्य वायरस के समान हमारे शरीर में कब प्रविष्ट हो जाते हैं, हमें पता ही नहीं चलता। जब इनके घातक परिणाम सामने आने लगते हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
इनमें से सबसे अधिक घातक है - क्रोध, जो भीतर-बाहर सब कुछ जलाकर खाक कर देता है। फिर पश्चाताप के सिवाय हमारे हाथ कुछ नहीं लगता।
जब हम अपने घर में बैठे हों और बाहर अचानक आंधी-तूफान आने लगे तो हम क्या करते हैं? सबसे पहले हम घर की खिड़की-दरवाज़े बंद करते हैं ताकि बाहर की गंदगी, धूल-मिट्टी अन्दर न आ सके। हम आंधी-तूफान के शांत होने की प्रतीक्षा करते हैं और उसके बाद बाहर आकर जायज़ा लेते हैं कि तूफान ने क्या-क्या तहस-नहस कर दिया?
यही परिस्थिति क्रोध रूपी तूफान के आने पर सामने आती है। यदि हमें किसी बात पर क्रोध आ रहा है या सामने वाला क्रोध में है तो सबसे पहले स्वयं को वहाँ से दूर हटा लो और अपने आँख, कान, मुँह आदि के पट बंद कर लो। वह क्रोध रूपी तूफान कुछ समय में स्वयं ही शांत हो जाएगा। हमारी चुप्पी क्रोध की अग्नि में पानी का काम करेगी और यदि हम उसका सामना करने की कोशिश करेंगे तो वह आग में घी का काम करेगी। जब क्रोध शांत हो जाए, तब उस के कारण व उपाय पर चर्चा की जा सकती है।
एक बच्चा बहुत गुस्सैल था। बात-बात पर नाक-भौं सिकोड़ना, चीखना, चिल्लाना उसकी दिनचर्या में शामिल हो गया था। हर समय अपनी माँ की नाक में दम किए रहता था। पिता कई दिन से उसे सुधारने का उपाय खोज रहा था। उन्होंने पञ्चतन्त्र की कहानी के आधार पर उसे ठीक करने का तरीका अपनाया।
उन्होंने बच्चे को अपने पास बुलाया और कहा कि चलो! एक game खेलते हैं। यह कागज़ लो और ये रही कुछ ऑलपिन। जब तुम्हें गुस्सा आने लगे और चीखने- चिल्लाने का मन करे तो इस कागज में एक ऑलपिन गाड़ देना। इस प्रकार तुम्हारी instinct भी शांत हो जाएगी और किसी को दुःख भी नहीं होगा।
15 दिन के बाद बच्चा कागज में सभी पिनें लगाकर अपने पिता के पास ले आया। इतने दिन तक एक बदलाव भी देखने को मिला कि घर में उसका चीखना-चिल्लाना कम सुनाई देने लगा। गुस्सा आने पर वह कागज़ में पिन लगाने दौड़ पड़ता।
बच्चे ने पिता से पूछा कि अब इस कागज़ का क्या करोगे?
पिता ने कहा - चलो! अब अगला step समझाते हैं। जब तुम्हें यह लगे कि आज मैंने अपनी माँ का कहना माना है और उन्हें तंग भी नहीं किया, चीख-चिल्लाहट नहीं की तो इसमें से एक-एक पिन निकालते रहना।
अब तो बच्चे को भी इस गेम में मज़ा आने लगा था। उसने पिता के कथनानुसार जल्द ही सारी पिनें निकालने की कोशिश की ताकि वह पिता की नज़रों में अच्छा साबित हो सके। वह अपनी माँ का कहना भी मानने लगा।
10 दिन भी नहीं बीते थे कि बच्चा हंसते हुए पिता के पास आकर कहने लगा कि लो अपना कागज और ये रही सारी पिनें।
‘पिताजी! इस गेम में तो बहुत मज़ा आया। दोबारा यही गेम खेलते हैं।'
पिता ने उसे फिर से गुस्सा आने पर पिनें लगाने के लिए दे दी। बच्चा कागज और पिनें लेकर चला गया। पर पिता रोज़ कागज़ को देखते तो पाते कि उस पर 3-4 दिन तक एक भी पिन नहीं लगी थी।
एक दिन उन्होंने बच्चे से पूछ ही लिया कि क्या बात? तुमने अभी तक गेम शुरू क्यों नहीं किया?
जानते हो, बच्चे ने क्या उत्तर दिया?
बच्चे ने कहा कि पिताजी! अब मेरा गुस्सा करने का मन ही नहीं होता। अब तो मुझे माँ का कहना मानने में आनन्द आने लगा है। मुझे इसका बहुत लाभ हुआ है। मेरा सारा काम ठीक समय पर होने लगा है। पढ़ाई के साथ-साथ खेलने का भी पर्याप्त समय मिल जाता है। और आपको क्या बताऊँ? जब-जब मैं माँ का कहना मानता हूँ तो माँ मुझे बहुत प्यार करती है और मेरा मनपसन्द भोजन बना कर खिलाती है।
तब पिता ने समझाया कि इस कागज़ का हाल तो देखो। पिन लगाने से जगह-जगह छेद हो गए हैं। अब यह कागज़ किसी के काम नहीं आ सकता।
‘हाँ पिताजी! अब मुझे पता चला कि मेरे चीखने-चिल्लाने से माँ के मन में भी कितने छेद हो जाते होंगे?’
काश! हम भी जान पाते कि हमारे क्रोध की ऑलपिनें हमारी खुशियों में निरन्तर छेद कर रही हैं और हमारे मन में जो थोड़ी-बहुत खुशी बची हुई थी, वह भी उन छिद्रों से रिस-रिस कर बाहर बह चुकी है।
स्व-अनुभूत प्रयोग
जब मुझे इस उपाय के बारे में ज्ञात हुआ तो मैंने यही प्रयोग शतरंज की गोटियों के साथ अपने घर में 5-6 वर्ष के बच्चे पर किया। वह इकलौता बच्चा छोटी-छोटी बातों पर रोने लगता था। जिन्हें हम छोटी-छोटी बातें मानते हैं, हो सकता है कि वे ही बातें उसके लिए बहुत बड़ी हों, पर मैंने उसे समझाया कि देखो! इस तरह तुम बात-बात पर रोने लगोगे तो तुम्हारी सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ेगा। चलो! आज शतरंज की गोटियों से नया खेल खेलते हैं। जब भी रोने का मन करे तो तुरन्त एक काली गोटी उठाना और chess board पर रख देना और सोचना कि मेरा खून भी जलने से काला हो रहा है। इसी तरह जब तुम खुश होते हो तो खून बढ़ता है। तब तुम सफेद गोटी अपने chess board पर रख देना।
फिर रात को हम गिन कर देखेंगे कि काली गोटी कितनी हैं और सफेद गोटी कितनी हैं? आप विश्वास नहीं करेंगे कि 3-4 दिन में ही काली गोटियाँ कम होने लगीं और सफेद गोटियाँ बढ़ने लगी। एक सप्ताह में उसका बात-बात पर रोना बंद हो गया। इस छोटे-से प्रयोग ने उसके जीवन को खुशियों से भर दिया। आज वह बच्चा 13 वर्ष का है और उसके बाद आज तक मैंने उसे कभी रोते हुए नहीं देखा।
यह तो हुई बच्चे की बात, वयस्क भी रात को सोते समय अपनी दिनचर्या पर एक नज़र अवश्य डालें या एक डायरी बना लें कि आज कितनी बार हमें क्रोध आया और क्यों आया? साथ-ही यह भी जानें कि कितनी बार हमें खुशी महसूस हुई?
दोबारा क्रोध न करने का प्रण लेकर ही सोने जाएं, क्योंकि आप स्वयं ही स्वयं को खुश कर सकते हैं, कोई और नहीं।
वास्तव में खुशी का झरना हमारे अन्दर है, इसे स्वतन्त्रता से बहने दो।
--
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
Very nice thank u
ReplyDeleteMany many thanks for appreciation
DeleteBahut acchi story h touching wali h
ReplyDeleteGood way to control anger.
ReplyDelete