प्यारी बिटिया
प्यारी बिटिया
सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा
Presented by Bindu Jain, Delhi
एक नन्हीं सी कली, मेरे आँगन में खिली;
उठाया जो मैंने गोद में, वह मुस्काई मन-मोद में;
प्यार से जो मैंने सहलाया, चेहरा था उसका दमकाया;
दुलार के जल से सींचा मैंने,
वह बढ़ती गई और खिलती गई;
बेटी बनकर मेरे घर में आई, मेरे मन की बगिया महकाई;
न चाहे उसने खेल, न उसका सजने को मन करता है;
”मम्मी मेरा तो केवल, कुछ लिखने को मन करता है“;
नानी ने की भविष्यवाणी, लेखिका बनेगी यह तो इक दिन;
जग में नाम कमाएगी, और सबकी शान बढ़ाएगी;
जीवन उसका संगीत बन गया, और संगीत बना जीवन;
अपनी मंजिल पाने को वह, तत्पर रहती थी हर पल;
कली खिली और फूल बन गई, सारा चमन महका गई;
इक दिन माँ का छोड़ के आँगन, पिया के घर की शोभा बनी;
अब मैं....अब मैं घर में रह गई अकेली, जैसे बिछड़ गई हो कोई सहेली;
वो हँसती थी बतियाती थी, सब की उलझन सुलझाती थी;
सब के कामों में हाथ बँटा, वह पढ़ती और पढ़ाती थी;
वह हँसी गूँजती कानों में, पर आँखें देख न पाती हैं;
उस की बातों को याद करूँ, तो आँख मेरी भर आती हैं;
मेरी यही दुआ है भगवन्, वह सुखी रहे सुखसाद रहे;
जैसे मुझको खुशियाँ दी, वह खुशियों से आबाद रहे;
जैसे मेरे मन-आँगन में, वह खुशी के दीप जलाती थी;
वैसे ही उसके आँगन की, हर रात बने दीवाली सी;
सास-ससुर में छवि दिखे माँ-बाप की, मन में हर्षाए;
भगवन् उसके आँगन में, रत्नों की वर्षा बरसाएं।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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