मुरझाया चमन

*मुरझाया चमन*

सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा

Sung by - Bindu Jain, Delhi


हर सुबह जब आईना मैं देखता हूँ, 

वक्त की पहचान मुख पर देखता हूँ;

 श्वेत केशों में छिपी जो कालिमा थी,

कब व कैसे धुल गई, मैं सोचता हूँ।

(1) वक्त के तूफान से टूटा घरौंदा,

है न कश्ती और न साहिल, खोजता हूँ।

(2) जिन्दगी रोशन थी मेरी जिसके दम पर,

उस शमा को मैं पिघलते देखता हूँ।

(3) मेरे माथे की लकीरें कह रही हैं, 

उम्र को यूँ ही गुज़रते देखता हूँ। 

(4) दर्द से रिश्ता जो मेरा बन गया है,

उन ही रिश्तों को बिखरते देखता हूँ।

(5) आँख नम होने लगी उनके विरह में,

होठों को मैं थरथराते देखता हूँ।

(6) आशियाँ में कब उदय होगा दिवाकर, 

उन पलों की राह ही मैं देखता हूँ।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 

Comments

  1. अति सुन्दर अभिव्यक्ति साधुवाद

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