Don’t be fussy over trifles.

 तुच्छ बातों पर उपद्रव मत करो।
Don’t be fussy over trifles.

 

ऊँचे विचारों वाले बनो और छोटी-छोटी बातों को बड़ा मसला मत बनाओ। माफी मांगना और माफ करना सीखो। तुच्छ बातों पर बवाल मचाने से तुम्हारा झूठा अभिमान संतुष्ट होता है। इससे कोई लाभदायक उद्देश्य प्राप्त नहीं होता।

छोटी बातों पर उपद्रव न करें - 

यह एक लघुकथा है, जो छोटी-छोटी बातों में, सच में ...छोटी बातों पर उपद्रव न करने का संदेश देती है। यह लघुकथा सिखाती है कि धैर्य ही सुख की कुंजी है। एक छोटी-सी दरार (जैसे बांध में दरार) की अगर अनदेखी की जाए, तो एक पूरे शहर को डुबो सकती है; ठीक वैसे ही जैसे छोटी-छोटी पारिवारिक बहसें बड़े विवादों में बदल जाती हैं। अतः संयम और समझदारी से ही रिश्तों में प्रेम बना रह सकता है, उपद्रव से नहीं। 

छोटी-छोटी बातों पर न भड़कें - लघुकथा

राम और श्याम दो पड़ोसी थे। राम बहुत ही शांत स्वभाव का था, जबकि श्याम हर छोटी बात पर उपद्रव मचाने के लिए मशहूर था। एक दिन, राम के घर की छत से पानी की कुछ बूंदें श्याम के आंगन में टपकने लगीं। यह एक मामूली सी बात थी, लेकिन श्याम ने इसे मुद्दा बना लिया।

उसने शोर मचाना शुरू कर दिया, “देखो! इस राम ने मेरी शांति भंग कर दी। अब मैं इसकी छत को तोड़कर ही दम लूँगा।“

श्याम के परिवार के लोग भी उसे रोकने के बजाय उसका साथ देने लगे। देखते ही देखते घर के बच्चे और आस-पड़ोसी भी इकट्ठा हो गए, एक बड़ा-सा ड्रामा बन गया। श्याम गुस्से में राम के घर की ओर भागा।

राम घर पर शांत बैठा था। उसने श्याम को देखकर कहा, “भाई! थोड़ा पानी ही तो गिरा है। आ, चाय पीते हैं और दोनों मिलकर छत ठीक कर लेंगे। छोटी-सी बात पर क्यों अपना और मेरा मूड खराब कर रहे हो?“ 

राम की शांति देखकर श्याम ठिठक गया। उसे अपनी बेवकूफी का एहसास हुआ। छोटी सी दरार, जिसे प्यार से भरा जा सकता था, उसे उसने उपद्रव का कारण बना लिया था। उसने चैन की सांस ली, और दोनों ने मिलकर छत ठीक की।

सीखः छोटी-छोटी बातों पर उपद्रव (गुस्सा) करना, खुद के सुख में भी बाधा डालना है। धैर्य और प्यार से बड़ी से बड़ी समस्या का हल निकल सकता है।

 इसी प्रकार कार्यालय में छोटे मामलों पर निर्णय लेने के लिए अपना बहुत अधिक समय व्यर्थ न गंवाओ, बल्कि अपने जूनियर अफसरों को ऐसे मामले सौंप दो, ताकि उनमें भी आत्म-विश्वास बढ़े और अपना समय भी व्यर्थ में नष्ट न हो। अपने झूठे दंभ को विकसित न करो कि यह दुनिया तुम्हारे कारण ही चल रही है। अनुभव करो कि इस दुनिया को चलाने में प्रत्येक व्यक्ति महत्त्वपूर्ण है और जितनी तुम्हारे अन्दर क्षमता है, उतनी ही क्षमता उसमें भी है। तुम कोई अकेले ही बुद्धिमान नहीं हो।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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