प्रेम और समर्पण
प्रेम और समर्पण
उसी समय हनुमान जी आकाश मार्ग से द्वारिका के ऊपर से गुजर रहे थे। समुद्र की लहरों के बीच बसी सुंदर नगरी को देखकर उनके मन में बाल सुलभ उत्सुकता जागी। अचानक उन्हें राजमहल की ओर से आती मिष्ठान की अद्भुत सुगंध महसूस हुई। हनुमान जी मुस्कुराए और बोले, "अरे वाह! यह कैसी सुगंध है? ऐसा लगता है जैसे माता सीता के हाथों से बना हुआ प्रसाद हो। उत्सुकता में वे अपनी दिव्य शक्ति से स्वयं को अदृश्य करके राजमहल के भीतर प्रवेश कर गए।
हनुमान जी धीरे-धीरे रसोई तक पहुंचे। जैसे ही उन्होंने सामने रखे मोदक और लड्डुओं को देखा उनकी आंखों में बालक जैसी चमक आ गई। उन्होंने एक लड्डू उठाया और प्रेम से उसका स्वाद लिया। फिर दूसरा फिर तीसरा। देखते ही देखते उनका मन प्रसाद के स्वाद में ऐसा रम गया कि उन्हें समय का ध्यान ही नहीं रहा। थोड़ी देर बाद रसोई में रखी सारी मिठाइयां समाप्त हो चुकी थीं। हनुमान जी ने चारों ओर देखा और मुस्कुराते हुए चुपचाप वहां से निकल गए।
कुछ देर बाद रानी रुक्मणी रसोई में पहुंचीं। उन्होंने जैसे ही खाली थालियां देखीं, वे आश्चर्य से कुछ क्षणों तक उन्हें देखती रह गईं। महोत्सव के लिए तैयार किया गया पूरा प्रसाद गायब था। रुक्मणी जी ने तुरंत सेवकों से पूछा, "यह सब प्रसाद कहां गया? लेकिन किसी के पास कोई उत्तर नहीं था। उन्हें समझ नहीं आया कि इतनी बड़ी मात्रा में मिष्ठान आखिर कौन ले गया।
रुक्मणी जी ने तुरंत बलराम जी को पूरी घटना बताई। बलराम जी ने जब यह सुना तो उनका मुख गंभीर हो गया। उन्होंने कहा "द्वारका के राजमहल में इतनी बड़ी चोरी और किसी को पता तक नहीं चला? जिसने भी यह किया है उसे सामने लाना होगा। तभी सभा के वातावरण में एक दिव्य गर्जना गूंजी और अगले ही क्षण वहां विशाल स्वरूप में हनुमान जी प्रकट हो गए।
बलराम जी ने हनुमान जी को देखते हुए कहा "हे वानर! तुमने द्वारका के राजमहल में प्रवेश करने का साहस कैसे किया? क्या तुम्हें पता है कि तुम किसके सामने खड़े हो? हनुमान जी शांत भाव से मुस्कुराए। उनकी आंखों में कोई भय नहीं था। उन्होंने कहा "मैं तो बस सुगंध के पीछे-पीछे चला आया था। रसोई में प्रसाद देखा तो मन रुक नहीं पाया। यदि अपराध हुआ है तो दंड स्वीकार है।
बलराम जी ने सैनिकों को आदेश दिया कि हनुमान जी को पकड़ लिया जाए। सैनिक पूरी शक्ति से उनकी ओर बढ़े लेकिन हनुमान जी ने बिना किसी कठोरता के केवल हल्का सा अपना हाथ हिलाया और सैनिक दूर जा गिरे। सैनिकों ने दोबारा प्रयास किया, लेकिन इस बार भी वे हनुमान जी को हिला तक नहीं सके। सभा में मौजूद सभी लोग आश्चर्य से यह दृश्य देखने लगे।
अब बलराम जी स्वयं आगे बढ़े। उन्होंने हनुमान जी की कलाई पकड़ी और उन्हें बाहर ले जाने का प्रयास किया। उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी लेकिन हनुमान जी ऐसे स्थिर खड़े रहे जैसे पर्वत अपनी जगह पर खड़ा हो। बलराम जी ने और अधिक बल लगाया, फिर भी हनुमान जी तनिक भी नहीं हिले।
तभी हनुमान जी ने मुस्कुराते हुए अपना पैर आगे बढ़ाया और उनके पैर का अंगूठा बलराम जी के चरण से हल्के से स्पर्श कर गया। बलराम जी को अचानक तीव्र पीड़ा का अनुभव हुआ और वे पीछे हट गए। रुक्मणी जी तुरंत आगे आईं और बोलीं, "पवनपुत्र, कृपया इन्हें कष्ट मत दीजिए।"
हनुमान जी ने तुरंत अपना पैर पीछे कर लिया और विनम्रता से बोले, "मैं इन्हें कष्ट कैसे दे सकता हूं? इनके नाम में मेरे आराध्य श्रीराम का नाम जुड़ा है।"
बलराम जी ने आश्चर्य से पूछा, "मेरे नाम में श्रीराम का नाम?"
हनुमान जी मुस्कुराए और बोले, "आपको अपने नाम का रहस्य स्वयं समझना होगा। मैं केवल इतना जानता हूं कि जिस व्यक्ति के नाम में मेरे प्रभु की स्मृति हो उसके प्रति मेरा हृदय अपने आप झुक जाता है।"
सभा में उपस्थित लोग इस रहस्यमयी संवाद को सुनकर और भी चकित हो गए।
हनुमान जी ने फिर कहा, "यदि आपको लगता है कि मैं आपकी शक्ति को चुनौती दे रहा हूं, तो एक शर्त रखता हूं। आप मुझे बाहुबल में पराजित कर दीजिए फिर मैं स्वयं आपकी सेवा में रहने को तैयार हूं।"
बलराम जी ने चुनौती स्वीकार कर ली। दोनों आमने-सामने खड़े हुए और उनके बीच शक्ति की परीक्षा आरंभ हुई।
कुछ क्षणों तक ऐसा लगा, जैसे दोनों की शक्ति बराबर हो। बलराम जी ने पूरा बल लगाया और हनुमान जी भी शांत भाव से अपनी शक्ति रोककर खड़े रहे। सभा में मौजूद सभी लोग सांस रोककर यह दृश्य देखने लगे। तभी हनुमान जी के मन में एक अद्भुत प्रश्न उठा - "यह कौन हैं? इनके भीतर इतनी अपार शक्ति क्यों है? इनके व्यक्तित्व में मुझे अपने प्रभु की कोई परिचित झलक क्यों दिखाई दे रही है?"
हनुमान जी ने अपनी गदा से नहीं, बल्कि केवल अपनी उंगली से धरती पर एक दिव्य रेखा खींची और बोले, "यदि आप वास्तव में मुझे पराजित करना चाहते हैं, तो इस रेखा को पार करके दिखाइए।"
बलराम जी ने पूरी शक्ति लगाई। उनके कदम आगे बढ़े लेकिन वह दिव्य रेखा जैसे पर्वत बन गई। वे जितना प्रयास करते, उतना ही उन्हें महसूस होता कि कोई अदृश्य शक्ति उन्हें रोक रही है।
अचानक बलराम जी के भीतर पुरानी स्मृतियों की एक लहर उठी। उन्हें अपने पूर्व स्वरूप की झलक महसूस हुई। उनके मन में अयोध्या, वनवास, श्रीराम और लक्ष्मण से जुड़ी दिव्य स्मृतियां जैसे जाग उठीं। उनकी आंखें नम हो गईं। वे समझ गए कि सामने खड़ा यह साधारण वानर नहीं बल्कि वही परम भक्त है जिसकी भक्ति के सामने स्वयं देवता भी नतमस्तक होते हैं।
बलराम जी ने हनुमान जी को ध्यान से देखा और भावुक होकर बोले, "हे पवनपुत्र! अब मैं समझ गया। तुम्हारे भीतर वही अटूट भक्ति है, जो युगों से मेरे प्रभु श्रीराम के चरणों में समर्पित रही है। मुझे क्षमा कर दो।"
हनुमान जी की आंखों में भी प्रेम के आंसू आ गए। वे तुरंत बलराम जी के पास पहुंचे और विनम्रता से उनके चरणों में झुक गए।
बलराम जी ने उन्हें उठाकर गले लगा लिया। दोनों के हृदय में जैसे युगों पुराना स्नेह फिर से जाग उठा। सभा में उपस्थित सभी लोग इस दिव्य मिलन को देखकर भावुक हो गए। रुक्मणी जी की आंखों में भी प्रसन्नता के आंसू थे। कुछ क्षणों तक पूरा राजमहल शांत रहा, फिर वहां उपस्थित भक्तों के मुख से एक साथ जयघोष गूंज उठा "जय श्री राम! जय बलराम! जय पवनपुत्र हनुमान!"
उस दिन द्वारिका के लोगों ने समझा कि भगवान की लीलाओं में बाहरी रूप से दिखाई देने वाला संघर्ष हमेशा वास्तविक वैर नहीं होता। कभी-कभी वही शक्ति अलग अलग युगों में अलग-अलग रूप लेकर अपने प्रभु की सेवा करती है। हनुमान जी की भक्ति और बलराम जी की शक्ति का यह मिलन भक्तों के लिए प्रेम, सेवा और समर्पण का सुंदर संदेश बन गया।
कहा जाता है कि हनुमान जी के लिए सबसे बड़ा सम्मान शक्ति का प्रदर्शन करना नहीं, बल्कि अपने आराध्य से जुड़े प्रत्येक स्वरूप के प्रति प्रेम और विनम्रता रखना है। यही कारण है कि जब उन्हें बलराम जी में अपने प्रभु की झलक मिली तो उनका हृदय तुरंत श्रद्धा से भर गया। इस दिव्य लीला का संदेश यही है कि सच्ची भक्ति में अहंकार नहीं होता, केवल प्रेम और समर्पण होता है।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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