Illusion से बाहर निकलो

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दुःख को सुख में बदलने की कला

Illusion से बाहर निकलो (प्रेरणात्मक लेख)

Image by Patrick Turban from Pixabay

एक बार एक कुत्ते ने ऐसे काँच के महल में प्रवेश किया जिसकी दीवारें, फ़र्श व छत में दर्पण वाला काँच लगा था। जैसे ही उसने इधर-उधर दृष्टि दौड़ाई, उसे अपने चारों ओर, ऊपर-नीचे हज़ारों कुत्ते दिखाई दिए। वह स्वभाववश भौंका, तो वे हज़ारों कुत्ते भी उस पर भौंकने लगे। पूरे 24 घंटे यह क्रम चलता रहा और सुबह देखा तो वह कुत्ता क्षत-विक्षत होकर मृत अवस्था में पड़ा था। उसे किसने मारा? उन हज़ारों कुत्तों ने या उनके होने के भ्रम ने।

यदि उसे वास्तविकता का ज्ञान होता, तो वह कभी स्वयं को घायल न करता और मरने से बच जाता। 

उसने प्रतिबिम्ब को ही सत्य मान लिया। यही Illusion है।

भ्रम हमारी सबसे बड़ी दुर्बलता है जिसका शिकार मनुष्य ही नहीं, अन्य प्राणी भी होते हैं। एक गाय अपने बछड़े को केवल इसलिए दूध नहीं पिलाती थी कि वह मान कर बैठी थी, यह उसका बछड़ा नहीं है।

एक व्यक्ति अपने ऊँटों को लेकर जा रहा था। रास्ते में एक स्थान पर पड़ाव डाला और ज़मीन में खूँटे गाड़ कर सभी ऊँटों को रस्सी से बांध कर बिठा दिया। एक रस्सी कम पड़ गई और वह अंतिम ऊँट बिना रस्सी के बैठने को ही तैयार नहीं।

वहाँ एक संन्यासी की कुटिया थी। वह व्यक्ति संन्यासी से अपनी समस्या का हल पूछने गया कि इस ऊँट को कैसे बिठाया जाए? संन्यासी ने कहा कि तुम ज़मीन में खूँटा गाड़ो और अपने हाथ उसकी गरदन के चारों ओर इस प्रकार घुमाओ, जैसे उसके गले में रस्सी बांधी जा रही है। तुम्हारा ऊँट खूँटे के पास बैठ जाएगा।

ऐसा ही किया गया और वह ऊँट खूँटे के पास बैठ गया।

अगले दिन सुबह होने पर सभी ऊँटों को खूँटे से खोला गया। सब उठकर खड़े हो गए, पर पूरी ताकत लगाने पर भी आखिरी ऊँट नहीं उठा।

वह व्यक्ति फिर संन्यासी के पास गया और बताया कि कल तो वह ऊँट बैठने को भी तैयार नहीं था और आज उठने के लिए राज़ी नहीं है। मैं क्या करूँ?

संन्यासी ने कुछ देर सोचा और कहा - ‘तुमने उसके गले की रस्सी खोल दी क्या?

‘महात्मन्! मैंने उसके गले में रस्सी तो बांधी ही नहीं थी।’

‘पर वह तो यही मान कर बैठा है न कि मेरे गले में रस्सी बंधी हुई है और उसका एक सिरा खूँटे से बंधा है। जाओ, अब विपरीत दिशा में हाथ घुमाओ ताकि वह समझे कि रस्सी खूँटे से अलग हो गई है। तभी वह उठेगा।’

उस व्यक्ति ने ऐसा ही किया और वह ऊँट उठ कर खड़ा हो गया।

अब बताओ वह रस्सी और खूँटा वास्तविकता थी या उसका भ्रम था।

इसी प्रकार हम भी स्वयं को संसार के अदृश्य रस्सी और खूँटे से बंधा हुआ मान रहे हैं। जिस दिन हमारा यह भ्रम टूट जाएगा, उसी दिन हमें अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाएगा कि मैं केवल ‘मैं’ आत्मा हूँ, देह नहीं।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

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