Think less and do more
सोचो कम, करो ज़्यादा। Think less and do more
कुछ लोग अपना बहुत सारा समय सोचने और चिन्ता करने में ही व्यर्थ गंवाते है। वे अपनी कल्पना में ही बहुत सी योजनाएं बनाते हैं और लगातार सोचते रहते हैं कि वे यह करना चाहते हैं और वह करना चाहते हैं। यद्यपि उनके इरादे बुरे नहीं होते और असल में जीवन में कुछ सीखना और प्राप्त करना चाहते हैं लेकिन वे जो चाहते हैं, उसे प्राप्त नहीं कर पाते, क्योंकि उनका तरीका ठीक नहीं है। वे जो प्राप्त नहीं कर सके उसी की हताशा और निराशा में रहते हैं। यह इसलिए है क्योंकि उनका बहुत सारा समय सोचने में खो जाता है और जब वे वास्तव में काम करते हैं, तो उनका मन केवल भविष्य की योजनायं बनाने में ही लगा रहता है। इसलिए वे अपने वर्तमान के कार्य पर भी ठीक तरह से ध्यान लगाने में समर्थ नहीं होते।
एक गाँव में दो दोस्त रहते थे—आर्यन और कबीर। दोनों एक नया व्यवसाय शुरू करना चाहते थे।
आर्यन बहुत योजनाएँ बनाता था। वह दिन-भर डायरी लेकर बैठता और सोचता, "अगर बारिश हुई तो क्या होगा? अगर ग्राहक नहीं आए तो क्या होगा? सबसे अच्छा मुहूर्त कब होगा?" वह महीनों तक बस 'परफेक्ट' प्लान बनाने में ही खोया रहा।
दूसरी ओर, कबीर ने सोचा, "सीखते-सीखते ही आगे बढ़ेंगे।" उसने एक छोटी सी दुकान ली और काम शुरू कर दिया। पहले महीने उसे घाटा हुआ, उसने सुधार किया। दूसरे महीने उसे समझ आया कि ग्राहक क्या चाहते हैं।
छह महीने बाद, कबीर का काम चल पड़ा था और उसे व्यापार की सारी बारीकियां समझ आ चुकी थीं। वहीं आर्यन आज भी अपनी डायरी में 'जोखिम' और 'रणनीति' ही लिख रहा था। वह शुरू करने से पहले ही हार के डर से थक चुका था।
सीख: ज्यादा सोचना (Overthinking) केवल समय और ऊर्जा की बर्बादी है। सफलता सोचने से नहीं, शुरुआत करने से मिलती है। अधूरा काम, न किए गए 'परफेक्ट' काम से कहीं बेहतर है।
यद्यपि किसी कार्य को ठीक तरह से करने के लिए कुछ मात्रा में सोच- विचार और योजनाओं की आवष्यकता है लेकिन अपने मन में सतत अन्दरूनी बातचीत करना वांछित नहीं है। इस अन्दरूनी बातचीत को रोकने और जीवन में अधिकतम पाने का सबसे अच्छा रास्ता है कि अपने आप को अमिक समय तक खाली रखने और दिवा-स्वप्न देखने की आज्ञा न दें। कामों की अपनी लम्बी सूची में से कुछ कामों को प्राथमिकता के अनुसार हाथ में लें और वह काम करना आरंभ कर दें। तुम्हारी हताशा का वास्तविक कारण यह है कि तुम सभी चीज़ों को उसी समय या कम से कम समय में प्राप्त करना और सीखना चाहते हो और यह, जैसा तुम जानते हो, गणितीय पहलू से संभव नहीं है। इसके अतिरिक्त तुम यह भी जानते हो कि समय के साथ-साथ तुम्हारी इच्छएं और योजनाएं भी बदलती रहती हैं।
उदाहरण के लिए जैसी 20 वर्ष पहले तुम्हारी इच्छाएं और योजनाएं थीं, वैसी आज नहीं हैं। तब तुम जिन बातों के लिए व्याकुल थे, वैसे आज तुम नहीं हो। इसीलिए तुम्हें अपने आनन्द के लिए किसी अन्य दिन की प्रतीक्षा नहीं करनी है क्योंकि वह तुम्हें आज ही प्राप्त हो सकता है। तुम्हें अपने प्रत्येक काम पर पूरी तरह ध्यान केन्द्रित कर के काम करने के तरीके ;च्तवबमेद्ध में आनन्द अनुभव करना चाहिए जो तुम्हें अन्तिम लक्ष्य को पूरा करने की तरफ़ ले जाएगा। तुम्हारी आनन्द प्राप्त करने की योग्यता इस पर निर्भर करती है कि जब तुम कोई काम कर रहे हो तो अपनी तरफ़ से जितना अच्छा तुम कर सकते हो, उतना ही अच्छा करने का प्रयत्न करो।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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