Reduce the velocity of your mind
अपने मन की गति को कम करो।Reduce the velocity of your mind
अधिकतर लोगों का मन एक विचार के बाद दूसरे विचार के कारण भयानक गति से दौड़ता है। उनका मन एक पल के लिए भी स्थिर होने में समर्थ नहीं है। वे हमेशा योजनाएं बनाते रहते हैं, चिन्तित रहते हैं, सोचते रहते हैं और तनाव ग्रस्त रहते हैं। धीरे-धीरे यह आदत गहरी जड़ पकड़ लेती है और एक तरह का मन ही बन जाता है। यहां तक कि जब कोई चिन्ता की बात भी नहीं होती, तब भी ऐसे लोग चिन्ता का कोई न कोई कारण खोज लेते हैं और उस व्याकुलता के अधीन हो जाते हैं। जब कुछ करने के लिए नहीं होता तो भी वे इस अवसर का उपयोग, अपने मन को विश्राम देने के स्थान पर, तनावग्रस्त रहने में करते हैं।
मन की तीव्र गति से क्या अर्थ है? यह एक समय की इकाई में आपके मन में घूमने वाले विचारों का संकेत देने वाला मापक है। अपने मन की गति को कम करने का वास्तव में अर्थ है कि विचारों की संख्या को कम करना। अपने मन में समय की इकाई के अनुसार, मान लो पहले एक मिनट में 100 विचार मन में आते थे और अब उतने ही समय में 50 विचार आते हैं। इस का अर्थ है कि तुमने काफी हद तक अपने विचारों की गति को धीमा कर लिया है। सभी नकारात्मक भावनाओं और तनाव के दौरान विचारों की गति तेज़ हो जाती है और अधैर्य, व्याकुलता और निराशा की भावनाओं के दौरान और भी अधिक (significantly) तेज़ हो जाती है।
एक बार एक व्यक्ति महात्मा बुद्ध के पास गया और बोला, "भगवन, मेरा मन बहुत अशांत रहता है। यह हर समय भविष्य की चिंताओं और अतीत की यादों में दौड़ता रहता है। मैं इसकी गति को कैसे कम करूँ?"
बुद्ध ने मुस्कुराते हुए उसे पास की एक नदी से पानी लाने को कहा। जब वह व्यक्ति नदी के किनारे पहुँचा, तो उसने देखा कि अभी-अभी कुछ जानवर नदी पार करके गए थे, जिससे नदी का पानी गंदा और मटमैला हो गया था। वह खाली हाथ लौट आया और बुद्ध को बताया कि पानी बहुत गंदा है।
बुद्ध ने कहा, "थोड़ी देर यहीं बैठो और शांत रहो।"
कुछ समय बीतने के बाद बुद्ध ने उसे फिर से पानी लाने भेजा। इस बार नदी का पानी बिल्कुल साफ और स्थिर था। मिट्टी नीचे बैठ चुकी थी। वह व्यक्ति पानी लेकर आया और बुद्ध से इसका कारण पूछा।
बुद्ध ने समझाया, "जिस तरह नदी के पानी को साफ करने के लिए तुम्हें कुछ नहीं करना पड़ा, बस उसे समय और शांति दी, वैसे ही तुम्हारा मन है। जब तुम अशांत हो, तो जबरदस्ती विचार रोकने की कोशिश मत करो। बस शांत होकर बैठ जाओ और अपने विचारों को बहने दो। जैसे ही तुम 'कर्ता' बनना छोड़ दोगे, मन की हलचल अपने आप शांत हो जाएगी और उसकी गति धीमी हो जाएगी।"
सीख: मन की शांति प्रयास से नहीं, बल्कि धैर्य और साक्षी भाव (सिर्फ देखने) से आती है।
मन की तीव्र गति या विचारों की भयंकर भीड़ का मन में होना कमज़ोर और अनियंत्रित मन के ही आवष्यक रूप से लक्षण हैं। एक नियंत्रित मन अन्य किसी विचार को मन में आने देने की आज्ञा दिये बिना एक ही विचार को जितनी देर वह चाहे उतनी देर टिकाए रख सकता है, यहां तक कि चाहने पर वह विचारशून्य भी रह सकता है।
मन की गति को कम करने का तरीका है कि वर्तमान में जो काम तुम्हारे हाथ में है, केवल उसी पर ध्यान लगाओ। भूतकाल की याद में और भविष्य की आशाओं और आशंकाओं में मत रहो। वर्तमान में रहना सीखो। जब तुम आने वाले समय के बारे में सोचते हो और भूतकाल व भविष्य से प्रभावित होते हो तभी तुम्हारे मन की गति बढ़ जाती है और इससे वर्तमान में हाथ में लिए हुए कार्य का सम्पादन बिगड़ जाता है।
सामान्यतया कुछ करते समय, हम आने वाले समय के बारे में सोचते हैं कि जब यह काम समाप्त हो जाएगा तो हम अपने आराम का आनन्द लेंगे। इस प्रक्रिया में हम वर्तमान को नकार देते हैं और अपना समय नाख़ुशी में बिताते रहते हैं। यह हमारा भविष्य पर आधारित और भागता हुआ मन है जो वर्तमान के पल की ख़ुशी को बंधक बना लेता है और हमारे मन को निरंतर हलचल व घबराहट में रखता है। एक बार तुम हाथ में लिए हुए कार्य के लिए मन की गति को कम करना सीख लो तो तुम पाओगे कि बहुत से साधारण और सांसारिक काम जो पहले ऊबाऊ थे, अब दिलचस्प हो गए हैं और बड़े आनन्द और सन्तुष्टि का स्रोत बन गए हैं।
यह आनन्द केवल विचारों की गति को धीमा करके और प्रत्येक पल पर ध्यान देकर मिल सकता है। हमारे आसपास जो घटनायं घट रहीं हैं, जिन्हें सामान्यतया अपने आप घटित हुई मानी जाती हैं और जो नीरस और अरुचिकर लगती हैं, वे ही बहुत रुचिकर और आनन्ददायी बन जाती हैं। यदि हम अपने काम में आनन्द और ख़ुशी का अनुभव करना चाहते हैं तो हमें अपने कामों से भागने का तरीका छोड़ना चाहिए और उन्हें जितनी जल्दी हो सके खत्म कर देना चाहिए। यह ख़ुशी प्रत्येक कार्य के प्रति जागृत और सावधान होने से मिल सकती है, चाहे वह कार्य कितना भी छोटा क्यों न हो।
यदि हम प्रत्येक छोटे काम के लिए भी सावधान नहीं हैं तो हम महत्त्वपूर्ण कामों के लिए भी सावधान नहीं हो सकते क्योंकि सोचने और काम करने का तरीका अचानक नहीं बदल सकता।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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