मेरे पति मेरे देवता (भाग - 85)

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मेरे पति मेरे देवता (भाग - 85)

श्री लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाएं

श्रीमती ललिता शास्त्री की ज़ुबानी

प्रस्तुतकर्ता - श्री उमाशंकर (जून, 1967)

शास्त्री जी की दो इच्छाएं

रानी साहिबा के प्रस्ताव पर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई। पर तब क्या मालूम था कि शास्त्री जी का स्वप्न उनकी मृत्यु के बाद साकार हो सकेगा, क्योंकि राजनीति से अवकाश होने के बाद शास्त्री जी दो काम करना चाहते थे। एक ‘आदर्श आश्रम’ की स्थापना करना और दूसरा पुस्तकें लिखना। वे दोबारा राजनीति में नहीं आना चाहते थे।

यद्यपि आश्रम तो स्थापित नहीं हो पाया, तथापि ‘शास्त्री-सेवा-निकेतन’ की स्थापना हो गई है और राजा साहब के महल में ही हुई है। राजा साहब ने ‘शास्त्री-सेवा-निकेतन’ के लिए महल ही नहीं दिया है, वरन् एक तरह से अपना सब कुछ दे रखा है। सेवा-निकेतन के लिए वे तन-मन-धन से जितना कर रहे हैं, उसका बख़ान नहीं किया जा सकता। हमें यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि राजा साहब के अभाव में शायद सेवा-निकेतन जिस रूप में इतनी जल्दी खड़ा हो सका है, उतनी जल्दी खड़ा हो पाता। राजा साहब उन इने-गिने व्यक्तियों में से हैं, जो कर्म से ही नहीं, स्वभाव और गुणों से भी असाधारण और अनुपम हैं।

अभी इसी गर्मी के महीनों में जब पानी के अभाव में हर तरफ़ त्राहि-त्राहि मची हुई थी, वे पहले ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने कुआँ खोदने का अभियान चलाया था और उस तपती हुई लू में गाँवों-गाँवों में घूम-घूम कर स्वयं कुएँ भी खोदे थे। बहुत पहले विनोबा जी के आह्वान पर उन्होंने अपनी सारी ज़मीन भूदान में दे डाली थी। राजा विश्वनाथ प्रतापसिंह जी की माँ धन्य है, जिन्होंने अपनी कोख से ऐसे पुत्र-रत्न को जन्म दिया है।

क्रमशः

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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