एक पहेली (भाग - 1)

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एक पहेली (भाग - 1)

Image by Pexels from Pixabay

मानव जीवन में, समय, परिस्थिति और स्थान बड़ी भूमिका अदा करते हैं। कई बार, जो कुछ भी घटित होना होता है, उसी के अनुरूप परिस्थितियां बनती चली जाती हैं।

कलियुग में एक ही चक्रवर्ती सम्राट हुए हैं और वे थे - सम्राट विक्रमादित्य। जिनके नाम पर भारतवर्ष में “विक्रम सम्वत्” की शुरुआत हुई।

विक्रमादित्य एक बहुत ही पराक्रमी, विद्वान, कुशल प्रजापालक, धर्मज्ञ एवं परोपकारी राजा थे।

वे गुरु गोरखनाथ के शिष्य राजा भर्तृहरि के अनुज (छोटे भाई) थे। राजा विक्रमादित्य अपनी प्रजा को पुत्रवत् प्यार करते थे तथा रात्रि में वेश बदल कर अपनी प्रजा के हालात और कुशलक्षेम जानने के लिए नगर भ्रमण हेतु निकल जाया करते थे।

एक बार यूँ ही राजा विक्रमादित्य, वेश बदल कर देर रात्रि में नगर भ्रमण हेतु निकले। भ्रमण करते-करते अमृत वेला का समय हो गया। पौ फटने लगी थी। भोर के इस समय राजा विक्रमादित्य नगर की परिक्रमा वाले मार्ग से गुज़र रहे थे। मार्ग के दूसरी ओर घना जंगल प्रारम्भ हो जाता था। यकायक राजा ने देखा कि एक नौजवान लक्कड़हारा कन्धे पर कुल्हाड़ी लिये जंगल में प्रवेश कर गया और लकड़ी काटने के लिए एक ऊँचे वृक्ष पर चढ़ गया।

तत्काल ही राजा विक्रमादित्य ने देखा कि एक भयानक रीछ दौड़ा आया और उसी वृक्ष पर चढ़ने लगा, जिस पर वह नौजवान लक्कड़हारा लकड़ी काट रहा था। रीछ को वृक्ष पर चढ़ते देख कर राजा को बड़ा अचम्भा हुआ, क्योंकि रीछ तो वृक्ष पर कभी नहीं चढ़ सकता। उस नौजवान लक्कड़हारे ने जब रीछ को अपनी ओर आते देखा, तो उसके हाथ पाँव फूल गए। भय के कारण उसके हाथ से वृक्ष की टहनी छूट गयी और पृथ्वी पर गिर कर उसके प्राण पखेरु उड़ गए। तब रीछ वृक्ष से नीचे उतरा और राजा के देखते ही देखते, उसने एक सुन्दर लड़की का रूप धारण कर लिया और जंगल के समीप ही स्थित एक कुएं की जगत (मुंडेर) पर जाकर बैठ गई।

राजा दूर खड़ा कौतुहल से यह सब देख रहा था और सोच रहा था कि यह लड़की बना हुआ रीछ अब क्या करेगा....?

क्रमशः

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


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