ज्ञानवाणी

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ज्ञानवाणी

Image by NoName_13 from Pixabay

राजस्थान के हाडोती क्षेत्र के बूंदी नगर में रामदास जी नाम के एक बनिया थे। वे व्यापार करने के साथ-साथ भगवान की भक्ति-साधना भी करते थे और नित्य संतों की सेवा भी किया करते थे।

भगवान ने अपने भक्तों (संतों) की पूजा को अपनी पूजा से श्रेष्ठ माना है क्योंकि संत लोग अपने पवित्र संग से असंतों को भी अपने जैसा संत बना लेते हैं। भगवान की इसी बात को मानकर भक्तों ने संतों की सेवा को भगवान की सेवा से बढ़कर माना है।

‘प्रथमभक्ति संतन कर संगा।’

रामदास जी सारा दिन नमक-मिर्च, गुड़ आदि की गठरी अपनी पीठ पर बांध कर गांव में फेरी लगाकर सामान बेचते थे जिससे उन्हें कुछ पैसे और अनाज मिल जाता था।

एक दिन फेरी में कुछ सामान बेचने के बाद गठरी सिर पर रखकर घर की ओर चले। गठरी का वजन अधिक था पर वह उसे जैसे-तैसे ढो रहे थे। भगवान श्री राम एक किसान का रूप धारण कर आये और बोले - ‘भगतजी! आपका दुःख मुझसे देखा नहीं जा रहा है। मुझे भार वहन करने का अभ्यास है। मुझे भी बूंदी जाना है। मैं आपकी गठरी घर पहुंचा दूंगा।’

गीता (अध्याय 9 श्लोक 14) में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है -

‘संत लोग धैर्य धारण करके प्रयत्न से नित्य कीर्तन और नमन करते हैं। भक्तिभाव से नित्य उपासना करते हैं। ऐसे प्रेमी संत मेरे और मैं उनका हूँ; इस लोक में मैं उनके कार्यों में सदा सहयोग करता हूँ।’

ऐसा कह कर भगवान ने अपने भक्त के सिर का भार अपने ऊपर ले लिया और तेजी से आगे बढ़कर आँखों से ओझल हो गये।

रामदास जी सोचने लगे - ‘मैं इसे पहचानता नहीं हूँ और यह भी शायद मेरा घर न जानता होगा। पर जाने दो। राम करे सो होय।’

यह कहकर वह रामधुन गाते हुए घर की ओर चल दिए। रास्ते में वे मन-ही-मन सोचने लगे - आज थका हुआ हूँ। यदि घर पहुंचने पर गर्म जल मिल जाए तो झट से स्नान करके सेवा-पूजा कर लूँ और आज कढ़ी-चपाती का भोग लगे, तो अच्छा है।

उधर किसान बने भगवान श्री राम ने रामदास जी के घर जाकर गठरी एक कोने में रख दी और जोर से पुकार कर कहा - ‘भगतजी आ रहे हैं। उन्होंने कहा है कि नहाने के लिए पानी गर्म कर देना और भोग के लिए कढ़ी-चपाती बना देना।’

कुछ देर बाद रामदास जी घर पहुंचे तो उन्होंने देखा कि सामान की गठरी कोने में रखी है। उनकी पत्नी ने कहा - ‘पानी गर्म कर दिया है। झट से स्नान कर लो। भोग के लिए गर्म-गर्म कढ़ी और फुलके भी तैयार हैं।’

रामदास जी ने आश्चर्यचकित होकर पूछा - ‘तुमने मेरे मन की बात कैसे जान ली।’

पत्नी बोली - ‘मुझे क्या पता तुम्हारे मन की बात? उस गठरी लाने वाले ने कहा था।’

रामदास जी समझ गए कि आज राम जी ने ‘भक्त-वत्सलतावश’ बहुत कष्ट सहा। उनकी आँखों से प्रेमाश्रु झरने लगे और वे अपने इष्ट के ध्यान में बैठ गये।

ध्यान में प्रभु श्री राम ने प्रकट होकर प्रसन्न होते हुए कहा - ‘तुम नित्य सन्त-सेवा के लिए इतना परिश्रम करते हो। मैंने तुम्हारी थोड़ी-सी सहायता कर दी तो क्या हुआ?’

रामदास जी ने अपनी पत्नी से पूछा - ‘क्या तूने उस गठरी लाने वाले को देखा था?’

पत्नी बोली - ‘मैं तो अंदर थी। पर उस व्यक्ति के शब्द बहुत ही मधुर थे।’

रामदास जी ने पत्नी को बताया कि वे साक्षात् श्री राम ही थे। तभी उन्होंने मेरे मन की बात जान ली।

दोनों पति-पत्नी भगवान की भक्तवत्सलता से भाव-विह्वल होकर रामधुन गाने में लीन हो गये।

संदेश - गीता (अध्याय 8 श्लोक 14) में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है -

अनन्यचेताः सततं यो मास्मरति नित्यशः।

तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः।।

अर्थात् ‘मेरा ही ध्यान मन में रखकर प्रतिदिन जो मुझे भजता है, उस योगी संत को सहज में मेरा दर्शन हो जाता है।’

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 सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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