तो फिर मोक्ष कब?

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तो फिर मोक्ष कब?

Image by Светлана Бердник from Pixabay

मानव मात्र मोक्ष का अधिकारी है और मानव शरीर मोक्ष प्राप्त करने के लिए ही मिला है। मानव शरीर धारण करके मोक्ष प्राप्त नहीं करेंगे तो फिर चौरासी लाख योनियों में फिर से भटकने की अवस्था आ जाएगी।

मनुष्य मात्र देह के बंधनों से छूटकर परम ब्रह्म में लीन होने की इच्छा करे, तो वह इसके लिए समर्थ भी है और स्वतंत्र भी है, क्योंकि वह परात्पर ब्रह्म का ही अंश है और उसमें ही लीन होने के लिए, मोक्ष प्राप्त करने के लिए उसका आखिरी सर्जन हुआ है।

किंतु जब तक वह इस जन्म के संपूर्ण प्रारब्ध भोग नहीं लेगा और पिछले अनादि काल के अनेक जन्म-जन्मांतर के जमा हुए असंख्य, हिमालय भर जाए उतने संचित कर्मों के ढेर, इस जीवनकाल के दरमियान साफ नहीं करेगा, उन कर्मों को भस्म नहीं करेगा, तब तक उसको बार-बार अनंत काल तक अनेक जन्म, अनेक देह धारण करने ही पड़ेंगे और तब तक जीव को मोक्ष मिल ही नहीं सकता।

जीव को मोक्ष प्राप्त करने की तीव्र इच्छा हो जाए, उसको प्राप्त करने का लक्ष्य बना ले, तो उसे तमाम संचित कर्मों का ध्वंस करना पड़ेगा। तमाम संचित कर्मों को ज्ञानाग्नि व योगाग्नि से भस्म करना पड़ेगा और वर्तमान जीवन के प्रारब्ध कर्मों को पूरी तरह से भोग लेना पड़ेगा।

इस जीवनकाल के दरमियान अभी से ही उसको नए क्रियमाण कर्म इस तरह से करने पड़ेंगे कि उन्हें करते ही तुरंत फल देकर शांत हो जाएँ। उसमें से एक भी क्रियमाण कर्म संचित कर्म की ढेरी में जमा होने नहीं पावे।

किंतु कठिनाई यह है कि जीव अपने जीवन काल के दरमियान भोगने के पात्र हुए प्रारब्ध कर्मों को भोगते-भोगते नए असंख्य क्रियमाण कर्म करता है और उनका फल भोगने के लिए दूसरे असंख्य जन्म धारण करने पड़ते हैं।

इसलिए इस विषय-चक्र, संसार-चक्र का अंत आता ही नहीं। तात्पर्य यह है कि पहले तो इस जीवनकाल में जो-जो क्रियमाण कर्म हम करें, वे ऐसी कुशलतापूर्वक करें, जिससे वह कर्म कदापि संचित न होने पावे और वह भविष्य में नए देह के बंधन में डाले नहीं। बस ऐसे कुशलतापूर्वक काम करते रहने का ही नाम ‘योग’ है।

इसलिए गीता में भगवान ने योग की व्याख्या की है कि -

योगः कर्मसु कौशलम्।।

अर्थात् योग से कर्मों में कुशलता आती है। विवेकवान व्यक्ति कर्म तो करता है, परन्तु पाप व पुण्य दोनों को त्याग कर, दोनों से मुक्त होकर कर्म करता है। हे अर्जुन! तुम भी ऐसे योग का मार्ग ग्रहण करो, जहाँ प्रत्येक कर्म विवेक से निःस्पृह होकर किया जाए। सम्यक् कर्म करो, फल और अफल का विचार न करो तथा प्रज्ञा और विवेक के साथ करो।

इसे हम एक उदाहरण के माध्यम से समझ सकते हैं। यदि हम खेती करते हैं, तो हमें समय और मौसम का सम्यक् ध्यान रखते हुए उत्तम बीज का बुद्धिपूर्वक चुनाव करना चाहिए। फल की चिंता नहीं करनी चाहिए। तभी हम मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं।

जय जय श्री राधे।

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 सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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