अष्टावक्र का ज्ञान

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अष्टावक्र का ज्ञान

Image by Bruno from Pixabay

ऋषि ने अपने शिष्य कहोड़ की प्रतिभा से प्रभावित होकर अपनी पुत्री सुजाता का विवाह कहोड़ से कर दिया। सुजाता के गर्भ ठहरने के बाद ऋषि कहोड़ सुजाता को वेदपाठ सुनाते थे। तभी सुजाता के गर्भ से बालक बोला - ‘पिताजी। आप गलत पाठ कर रहे हैं।’ इस पर कहोड़ को क्रोध आ गया और शाप दिया - तू आठ स्थानों से वक्र (टेढ़ा) होकर पैदा होगा। कुछ दिन बाद कहोड़ राजा जनक के दरबार में एक महान् विद्वान बंदी से शास्त्रार्थ में हार गए और नियमानुसार कहोड़ को जल समाधि लेनी पड़ी।

कुछ दिनों बाद अष्टावक्र का जन्म हुआ। एक दिन उसे माँ से पिता की सच्चाई पता चली तो अष्टावक्र दुःखी हुआ और बारह साल का अष्टावक्र बंदी से शास्त्रार्थ करने के लिए राजा जनक के दरबार में पहुँचा। सभा में आते ही बंदी को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी, लेकिन अष्टावक्र को सभा में देखकर सभी पंडित और सभासद हंसने लगे, क्योंकि वह आठ जगह से टेढ़े थे। उनकी चाल से ही लोग हंसने लगते थे। सभी अष्टावक्र पर हंस रहे थे और अष्टावक्र सब लोगों पर। जनक ने पूछा - ‘हे बालक। सभी लोगों की हंसी समझ आती है। लेकिन तुम क्यों हंस रहे हो?’

अष्टावक्र बोले - महाराज! आपकी सभा चमारों की सभा है, जो मेरी चमड़ी की विकृति पर हंस रहे हैं। इनमें कोई विद्वान नहीं है। ये चमड़े के पारखी हैं। मंदिर के टेढ़े होने से आकाश टेढ़ा नहीं होता है और घड़े के फूटे होने से आकाश नहीं फूटता है।

इसके बाद शास्त्रार्थ में बंदी की हार हुई। अष्टावक्र ने बंदी को जल में डुबोने का आग्रह किया। बंदी बोला - मैं वरुण-पुत्र हूँ और सब हारे हुए ब्राह्मणों को पिता के पास भेज देता हूँ। मैं उनको वापस बुला लेता हूँ।

सभी हारे हुए ब्राह्मण वापस आ गए। उनमें अष्टावक्र के पिता कहोड़ भी थे। इसके बाद राजा जनक ने अष्टावक्र को अपना गुरु बना लिया और उनसे आत्मज्ञान प्राप्त किया। राजा जनक और अष्टावक्र के इस संवाद को अष्टावक्र गीता के नाम से जाना जाता है।

शिक्षा -

जैसे आभूषण के पुराने या कम सुंदर होने से सोने की कीमत कम नहीं हो जाती, वैसे ही शरीर की कुरूपता से आत्मतत्व कम नहीं होता। कभी किसी व्यक्ति के शरीर की सुंदरता को देखकर प्रभावित या किसी की कुरूपता को देखकर घृणा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि शरीर तो हाड़-मांस से बना है। देखना है तो उसका ज्ञान, प्रेम और दिव्यता देखो, क्योंकि आत्मा सब की समान गुण वाली है।

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 सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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