कर भला तो हो भला

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कर भला तो हो भला

Image by 钧 张 from Pixabay

एक प्रसिद्ध राजा हुआ करते थे जिनका नाम रामधन था। अपने नाम की ही तरह प्रजा सेवा ही उनका धर्म था।

उनकी प्रजा भी उन्हें राजा राम की तरह सम्मान देती थी। राजा रामधन सभी की निष्काम भाव से सहायता करते थे, फिर चाहे वह उनके राज्य की प्रजा हो या अन्य किसी और राज्य की।

उनकी ख्याति सर्वत्र फैल गई थी। उनके दानी स्वभाव और व्यवहार के गुणगान उनके शत्रु राजा तक करते थे।

उन राजाओं में एक राजा था भीम सिंह, जिसे राजा रामधन की इस ख्याति से ईर्ष्या हुआ करती थी।

उस ईर्ष्या के कारण भीम सिंह ने राजा रामधन को हराने की एक रणनीति बनाई और कुछ समय बाद रामधन के राज्य पर आक्रमण कर दिया।

भीम सिंह ने छल से युद्ध जीत लिया और रामधन को अपनी जान बचाने के लिए जंगल में जाकर छुपना पड़ा। इतना होने पर भी रामधन की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई।

हर जगह प्रजा उन्हीं की चर्चा करती रहती थी। जिससे भीम सिंह परेशान हो गया और उसने राजा रामधन को मृत्युदंड देने का फैसला किया।

उसने ऐलान किया कि जो राजा रामधन को पकड़कर लायेगा वे उसे दस हज़ार सोने के दीनार देगा।

दूसरी ओर राजा रामधन जंगलों में ही भटकते रहे। तब उन्हें एक राहगीर मिला और उसने कहा - भाई! तुम इस प्रान्त के लग रहे हो, क्या मुझे राजा रामधन के राज्य का रास्ता बता सकते हो?

राजा रामधन ने पूछा - तुम्हें क्या काम है राजा से?

तब राहगीर ने कहा, मेरा बेटा बहुत बीमार है। उसके इलाज़ में मेरा सारा धन चला गया। सुना है राजा रामधन सभी की मदद करते हैं। सोचा कि उन्हीं के पास जाकर याचना करूँ।

यह सुनकर राजा रामधन राहगीर को अपने साथ लेकर भीमसिंह के पास पहुँचा। उन्हें देख दरबार में सभी अचंभित थे।

राजा रामधन ने कहा - हे राजन! आपने मुझे खोजने वाले को दस हजार दीनार देने का वादा किया था। मेरे इस मित्र ने मुझे आपके सामने पेश किया है, अतः इसे वह दीनार दे दें।

यह सुनकर राजा भीम सिंह को अहसास हुआ कि राजा रामधन सच में कितने महान और दानी हैं और उसने अपनी गलती को स्वीकार किया। साथ ही राजा रामधन को उनका राज्य लौटा दिया और सदा उनके दिखाये रास्ते पर चलने का फैसला किया।

दोस्तों इसी को कहते हैं - “कर भला तो हो भला”।

कहाँ एक तरफ भीम सिंह राजा रामधन को मारना चाहता था और कहाँ राजा रामधन की करनी देख वह लज्जित हुआ और उन्हें उनका राज्य लौटा दिया और स्वयं को उनके जैसा बनाने में जुट गया।

महान लोग सही कहते हैं - “कर भला तो हो भला”। रामधन की करनी का ही फल था जो वह हारने के बाद भी जीत गया।

उसने जिस तरह सभी की मदद की, उसकी मदद अंत में उसी के काम आई।

इसलिए कहते हैं मनुष्य को अपने कर्मों का ख्याल करना चाहिए। अगर आप अच्छा करोगे तो अच्छा ही मिलेगा। माना कि शुरू-शुरू में कष्ट होता है लेकिन अंत सदैव अच्छा होता है।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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