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Showing posts from December, 2025

नव वर्ष का स्वागत

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नव वर्ष 2026 का स्वागत जय श्री राम!! भारतमाता की जय!! हिन्दू पंचांग के अनुसार नववर्ष चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिन अर्थात् नववर्ष प्रतिपदा एवं गुड़ी पड़वा पर प्रत्येक वर्ष विक्रम संवत के अनुसार ‘चैत्र शुक्ल प्रतिपदा’ से आरम्भ होता है। यह ईसवी संवत के नववर्ष का आगमन सनातन नववर्ष का आगमन नहीं है। परन्तु जैसा व्यावहारिक रूप से अधिकतर प्रचलन है, उसका निर्वहन करते हुए हम सभी सन् 2025 को अंतिम भावभीनी विदाई देते हुए वर्ष 2026 का सुस्वागत कर अभिनन्दन, अभिवादन, अभिवन्दन करें। आओ! हम सब वर्तमान के आलोक में अतीत का आत्मावलोकन कर सुंदर, समृद्ध, सुख, शांति, स्वास्थ्य एवं सुंदर भविष्य की नवीनतम पगडंडियों का सृजन करें और जीवन को सहज व सरल बनाएं।  गत वर्ष मेरे द्वारा मन, वचन, कर्म से आप किसी को कोई ठेस पहुंची हो, तो मैं हृदय से क्षमा प्रार्थी हूं। आप सब के पावन सहयोग का कोटि-कोटि आभार व धन्यवाद व्यक्त करता हूं।  इन्हीं शुभ-कामनाओं के साथ - वेद गावड़ी हिसार (हरियाणा) की प्रसिद्ध कवयित्री श्रीमती अनिता जैन जी के हृदयस्पर्शी शब्दों में - गाएं ऐसा तराना नए साल में,  दर्द भागे पुराना नए साल में...

यम और नचिकेता

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  यम और नचिकेता की कथा :  आत्मज्ञान और समर्पण की अनमोल यात्रा यह कहानी कठोपनिषद से है, जिसमें ऋषि वाजश्र्वा, जो परम ज्ञानी थे, ने विश्वजीत यज्ञ किया। इस यज्ञ के द्वारा उन्हें जीवन में किसी भी प्रकार के दुःख या विषाद से मुक्ति मिलनी थी और वे हमेशा आनंदित रहना चाहते थे।  ऋषि वाजश्र्वा ने यज्ञ के दौरान अपना सम्पूर्ण धन दान देने का संकल्प लिया था। उनके पास याचकों की लंबी कतार लगी थी, और वह लगातार अपनी संपत्ति दान करते जा रहे थे। पहले तो अच्छी चीज़ें जा रही थीं, लेकिन धीरे-धीरे केवल बूढ़ी गायें बच गईं।  इस समय बालक नचिकेता, जो केवल 6 या 7 साल का था, यह सब देख रहा था। उसने अपने पिता से पूछा, “पिताजी, ये बूढ़ी गायें तो किसी काम की नहीं हैं, तो आप इन्हें क्यों दान कर रहे हैं?”  ऋषि वाजश्र्वा ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैंने संकल्प लिया है कि मैं सम्पूर्ण धन दान करूंगा, इसलिए मैं इन्हें अपने पास नहीं रख सकता।” हालांकि, ऋषि ने यह नहीं सोचा कि दान हमेशा उपयोगी वस्तुओं का किया जाता है, जो दूसरों के काम आए। अनुपयोगी वस्तु दान करने से तो किसी पर बोझ ही पड़ता है। नचिकेता के मन में ए...

माता अनसूइया

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  माता अनसूइया     भगवान को अपने भक्तों का यश बढ़ाना होता है, तो वे नाना प्रकार की लीलाएँ करते हैं। श्री लक्ष्मी जी, श्री पार्वती जी और श्री सरस्वती जी को अपने पातिव्रत्य का बड़ा अभिमान था। तीनों देवियों के अभिमान को नष्ट करने तथा अपनी परम भक्तिनी पतिव्रता धर्म चारिणी अनसूइया का मान बढ़ाने के लिये भगवान ने नारद जी के मन में प्रेरणा की। फलतः वे श्री लक्ष्मी जी के पास पहुँचे, नारद जी को देखकर लक्ष्मी जी का मुख कमल के समान खिल उठा।  लक्ष्मी जी ने कहाः आइये, नारद जी! आप तो बहुत दिनों बाद आये। कहिये, क्या हाल है?  नारद जी बोलेः माता! क्या बताऊँ, कुछ बताते नहीं बनता। अब की बार मैं घूमता हुआ चित्रकूट की ओर चला गया। वहाँ मैं महर्षि अत्रि के आश्रम पर पहुँचा। माता! मैं तो महर्षि की पत्नी अनुसूइया जी का दर्शन करके कृतार्थ हो गया। तीनों लोकों में उनके समान पतिव्रता कोई नहीं है।  लक्ष्मी जी को नारद जी की बात पर आश्चर्य हुआ।  उन्होंने पूछाः नारद! क्या वह मुझसे भी बढ़कर पतिव्रता है?  नारद जी ने कहाः माता! आप ही नहीं, तीनों लोकों में कोई भी स्त्री सती अनुसूइया की तुल...

संत की शरण

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  संत की शरण  एक गांव में एक ठाकुर थे।  उनके यहां एक नौकर काम करता था.. जिसके कुटुंब में बीमारी की वजह से कोई आदमी नहीं बचा।  केवल नौकर का लड़का रह गया। वह ठाकुर के घर काम करने लग गया... रोजाना सुबह वह बछड़े चराने जाता था.. और लौटकर आता तो रोटी खा लेता था। ऐसे ही समय बीतता गया। एक दिन दोपहर के समय वह बछड़े चरा कर आया तो ठकुरानी की नौकरानी ने उसे ठंडी रोटी खाने के लिए दे दी।  उसने कहा कि थोड़ी सी छाछ या रबड़ी मिल जाए तो ठीक है। नौकरानी ने कहा कि जा, जा, तेरे लिए बनाई है रबड़ी! जा, खाना हो तो ऐसे ही खा ले, नहीं तो तेरी मर्जी। उस लड़के के मन में गुस्सा आया कि मैं धूप में बछड़े चरा कर आया हूं, भूखा हूँ.. पर मेरे को बाजरे की सूखी रोटी दे दी.. रबड़ी मांगी तो तिरस्कार कर दिया.. वह भूखा ही वहां से चला गया।  गांव के पास में एक शहर था.. उस शहर में संतों की एक मंडली आई हुई थी.. वह लड़का वहां चला गया। संतों ने उसको भोजन कराया और पूछा कि तेरे परिवार में कौन हैं?  उसने कहा कि कोई नहीं है.. संतों ने कहा कि तू भी साधु बन जा.. लड़का साधु बन गया। संतों ने ही उसके पढ़ने की व्यवस्था ...

रूप बसंत

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रूप बसंत "रूप बसंत" एक प्रसिद्ध लोककथा है, जो हिंदी में प्रचलित है। यह कहानी दो भाइयों, रूप और बसंत की है, जिन्हें उनकी सौतेली माँ के कारण राज्य से निकाल दिया जाता है। अंततः, वे अपनी पहचान छिपाकर बड़े होते हैं और अपने राज्य पर फिर से अधिकार प्राप्त करते हैं। विशाल नगरी के महाराज चन्द्रसेन की दो रानियाँ थीं। एक ‘सुनीति’ जो बहुत ही भक्ति भाव वाली थी, दूसरी ‘कनकलता’ जो बहुत ही अभिमानी और अपनी ही मनमानी करने और कराने वाली थी। रानी सुनीति के दो बेटे थे - रूप कुंवर और बसंत कुंवर। दोनों ही बेटे बहुत ही एकाग्रता से राजविद्या पढ़ते थे। दूसरी रानी कनकलता का बेटा मान कुंवर बहुत ही उद्दण्ड और शरारती था। वह पढ़ाई पढ़ने की बजाय अपने मित्रों के साथ नगर में सबको परेशान कर अपना रोब जमाने निकल पड़ता था। छोटी-सी बीमारी में सुनीति रानी की मृत्यु के बाद रानी कनकलता ने दांवपेंच लगाकर दोनों कुंवरों को देश निकाला दिलवा दिया। राज्य से बाहर निकलने के बाद बड़े भाई रूप कुंवर ने छोटे भाई बसंत कुंवर को समझाया कि हमें किसी से भी यह नहीं कहना है कि हम महाराजा चन्द्रसेन के बेटे, राजकुमार हैं, क्योंकि ऐसा करने से अ...

नियम टूटने मत दो

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  नियम टूटने मत दो एक विद्वान पुरुष ग्रन्थ रचना करने में लगे थे। एक निर्धन विधार्थी की सहायता करने की इच्छा से उन्होंने उसे अपना लेखक बना रखा था। विद्यार्थी दूर रहता था। प्रतिदिन पैदल चलकर आता था। वे दो घंटे बोलते जाते थे और वह लिखता जाता था।  एक दिन उन्होंने उस विद्यार्थी से कहा - कल कुछ रात रहते ही आ जाना। ग्रंथ लिखवाकर मुझे बाहर जाना है।  बेचारे विद्यार्थी को पर्याप्त-रात रहते उठना पड़ा, अन्धेरे में ही चलकर उनके पास आया। परन्तु केवल एक पंक्ति लिखवाकर वे बोले - आज का काम हो गया। अब जा सकते हो। विद्यार्थी झुंझलाया। वह कुछ बोला नहीं; किन्तु उसके मुख का भाव देखकर वे बोले - असंतुष्ट मत होओ। आज तुमको ऐसी शिक्षा मिली है, जिस पर यदि चलोगे तो जीवन में सफलता प्राप्त करोगे।  वह शिक्षा यह है कि जो नियम बनाओ, उसे टूटने मत दो। चाहे जैसी स्थिति आवे, नियम का नित्य निर्वाह करो और हर परिस्थिति में सहनशीलता को धारण करो। गुरु के प्रति कभी मन को म्लान मत करो। तभी तुम अपने जीवन में सफल हो सकोगे।  -- सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह ले...

ज़िन्दगी पर भरोसा नहीं

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ज़िन्दगी पर भरोसा नहीं     वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से नहीं है भरोसा रे, ज़रा ज़िन्दगी का मज़ा लूट बंदे, प्रभु बन्दगी का। लगा के तू फैशन, सड़क पर निकलता, सजा के तू तन को, क्यों है अकड़ता। भरा है पिटारा ये - 2, इक गंदगी का, नहीं है भरोसा रे, ज़रा........ लगाए मोहब्बत से सुन्दर बग़ीचे, सजाए भवन जो, बिछा कर गलीचे।  मौन जो विधि कर गढ़े, नहीं साथ देते -2,  सदा आदमी का, नहीं है भरोसा रे, ज़रा........... उमर तेरी पल-पल, घटी जा रही है, निकट मौत छिन-छिन, चली आ रही है, समझ ले तू बंदे- 2, इशारा घड़ी का। नहीं है भरोसा रे, ज़रा........... चला के तू दिल में दया का फव्वारा, दिया दीन दुःखियों को, जिस ने सहारा, उसी का है जीवन- 2, हँसी का ख़ुशी का। मज़ा लूट लेने, प्रभु बन्दगी का। द्वारा -- सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें। धन्यवाद।  

परोपकारी साधु

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  परोपकारी साधु  बहुत पहले की बात है। हमारे देश में एक महान् परोपकारी साधु रहता था। वह साधु सारे जगत् को भगवान् मान कर पूजता था। दुःखियों की सहायता करना, पथ भ्रष्टों को मार्ग बतलाना, अपकारियों का भी उपकार करना, उसका दैनिक कार्य था। वह पुण्य के लोभ से नहीं, बल्कि स्वभाव से ही अच्छे कार्य करता था। जिस प्रकार सूर्य स्वाभाविक गति से प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार वह भी मानवता का प्रकाश फैला रहा था। स्वर्ग में रहने वाले देवता भी उसे दूर से ही देखकर आश्चर्यचकित थे कि इस शरीर धारी ने मृत्यु लोक में ही देवत्व कैसे प्राप्त कर लिया? वे इस महा पुरुष को पुरस्कृत करना चाहते थे। देवता रूप बदल कर उसके पास आये और कहने लगे - आप कहिए, क्या चाहते हैं? वरदान माँगिये। आपके स्पर्श से ही रोगी स्वस्थ हो जायेंगे।’’  साधु अपनी सेवा का पुरस्कार प्राप्त नहीं करना चाहता था। स्वयं में तृप्त होकर केवल अपना कर्तव्य पालन कर रहा था। उसने कहा हे देवताओं! मैं दैवी शक्ति नहीं चाहता हूँ। उसका अधिकारी तो केवल परमात्मा है। मैं अनधिकार चेष्टा नहीं करता हूँ। देवता निराश हो गये, फिर उससे प्रार्थना करने लगे, ’’वर माँ...

Nothing happens by chance

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  प्रत्येक कार्य के लिए कोई कारण होता है। अचानक या घटनावश कुछ नहीं होता। There is a reason for everything. Nothing happens by chance or by accident.  याद रखो कि हर घटना के पीछे कोई कारण होता है, कुछ भी अचानक या दुर्घटनावश नहीं होता। संसार का एक विशेष क्रम है। प्रत्येक कार्य ‘कारण और प्रभाव’ के सम्बन्ध से बंधा हुआ है। तुम्हारे साथ जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसका कारण यह है कि तुमने पूर्व में अपनी क्रियाओं से कोई कारण उपस्थित किये हैं और जब तक वे सभी कारण धीरे-धीरे परिणामों में नहीं बदल जाते और नए कारण तुम्हारे द्वारा उपस्थित नहीं किए जाते, तब तक तुम हमेशा के लिए ख़ुश और आज़ाद नहीं होंगे। एक बार की बात है। एक जंगल में एक बारहसिंगा रहता था। वह दिखने में बहुत ही सुंदर था, जिस कारण से उसको अपने खूबसूरत सींगों पर बहुत ही गर्व था और वह जब भी तालाब में पानी पीते हुए अपनी परछाई देखता था, तो सोचता कि मेरे सींग कितने खूबसूरत हैं, लेकिन मेरी टांगें कितनी पतली और भद्दी हैं! वह सोचता कि ‘काश! उसकी टांगें भी उसके सींगों की तरह खूबसूरत होती, तो वह और भी ज्यादा खूबसूरत दिखता!’ इस प्रकार वह अपनी ...

ज्ञान का अनुभव

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  ज्ञान का अनुभव वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से     ज्ञान बिना भक्ति अधूरी                                                                                     ज्ञान बिना शक्ति अधूरी ज्ञान बिना कल्पना अधूरी ज्ञान बिना सपना अधूरा ज्ञान बिना विचार अधूरा ज्ञान बिना आचार अधूरा ज्ञान बिना व्यवहार अधूरा ज्ञान बिना प्रचार अधूरा ज्ञान बिना चिन्तन अधूरा ज्ञान बिना मनन अधूरा ज्ञान बिना शान्ति अधूरी ज्ञान बिना क्रान्ति अधूरी ज्ञान बिना आस्था नहीं ज्ञान बिना विश्वास नहीं ज्ञान बिना सत्संग नहीं ज्ञान बिना आनन्द नहीं ज्ञान जीवन का आधार है ज्ञान सुखों का सार है ज्ञान से ही स्वयं को जान सकते हैं ज्ञान से ही ईश्वर को पहचान सकते हैं।। द्वारा -- सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादा...

शब्दों की चोट

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  शब्दों की चोट   स्वामी विवेकानंद अपने प्रभाव पूर्ण प्रवचन में भगवान के नाम की महिमा समझा रहे थे और श्रोता भाव विभोर होकर सुन रहे थे। तभी भीड़ में से एक व्यक्ति अचानक खड़ा हो गया। वह अपने को बहुत तर्कशील मानता था।  उसने कहा - स्वामी जी! नाम हो या शब्द, इन सब में क्या रखा है? इन्हें कह देने से क्या लाभ?  स्वामी जी ने शांत भाव से उसे समझाया कि शब्द मात्र ध्वनि नहीं, शक्ति होते हैं, पर वह व्यक्ति हर बात पर कुतर्क किए जा रहा था। अंत में स्वामी जी ने उसे देखकर मुस्कुराते हुए कहा - तुम मूर्ख हो, नासमझ हो, बेवकूफ हो। ऐसे कुतर्क केवल नालायक लोग ही करते हैं। यह सुनते ही वह तथाकथित तर्कशील व्यक्ति भड़क उठा। बोला - स्वामी जी! आप जैसे महान संन्यासी के मुख से ऐसे वचन शोभा नहीं देते। आपके शब्दों से मुझे गहरी चोट पहुँची है!  उसकी बात सुनकर स्वामी जी ज़ोर से हँस दिए। पूरी सभा आश्चर्य में पड़ गई कि ये कैसा हास्य?  स्वामी जी ने गंभीरता से कहा - बंधु! मैं तो केवल शब्द बोल रहा था। आपने स्वयं ही कहा था न कि शब्दों में क्या रखा है’? मैंने कोई पत्थर तो नहीं मारा, फिर इतनी चोट कैसी? उ...

राम राज्य

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  राम राज्य एक रात की बात है, माता कौशल्या जी को सोते में अपने महल की छत पर किसी के चलने की आहट सुनाई दी। उनकी नींद खुल गई। उन्होंने पूछा - कौन है? मालूम पड़ा कि श्रुतकीर्ति जी हैं। उन्हें नीचे बुलाया गया।  श्रुतकीर्ति जी, जो सबसे छोटी बहू हैं, आईं और चरणों में प्रणाम कर खड़ी रह गईं।  माता कौशल्या जी ने पूछा - श्रुति! इतनी रात को अकेली छत पर क्या कर रही हो, बिटिया ! क्या नींद नहीं आ रही? शत्रुघ्न कहाँ है? श्रुतकीर्ति की आँखें भर आईं, माँ की छाती से चिपटी, उनकी गोद में सिमट गईं, बोलीं - माँ! उन्हें तो देखे हुए तेरह वर्ष हो गए। उफ....! कौशल्या जी का हृदय काँप कर सिटपिटा गया। तुरंत आवाज लगी, सेवक दौड़े आए। आधी रात ही पालकी तैयार हुई, आज शत्रुघ्न जी की खोज होगी, माँ चलीं। आपको मालूम है शत्रुघ्न जी कहाँ मिले? अयोध्या जी के जिस दरवाजे के बाहर भरत जी नंदिग्राम में तपस्वी होकर रहते हैं, उसी दरवाजे के भीतर एक पत्थर की शिला है, उसी शिला पर, अपनी बाँह का तकिया बनाकर लेटे मिले। माँ सिराहने बैठ गईं, बालों में हाथ फिराया, तो शत्रुघ्न जी ने आँखें खोलीं,  उठे, चरणों में गिरे - माँ! आपन...

कैसा है?

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  कैसा है? वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से आँसू जता देते हैं कि दर्द कैसा है? बेरुखी बता देती है कि हमदर्द कैसा है? घमण्ड बता देता है कि कितना पैसा है? संस्कार बता देते हैं कि परिवार कैसा है? बोली बता देती है कि इन्सान कैसा है? बहस बता देती है कि ज्ञान कैसा है? स्पर्श बता देता है कि नीयत कैसी है?  वक्त बता देता है कि रिश्ता कैसा है?  विधि बता देती है कि विधान कैसा है?  क्रूरता बता देती है कि शैतान कैसा है?  कर्म बता देते हैं कि निगहबान कैसा है?  वाणी बता देती है कि विद्वान कैसा है?  व्यवहार बता देता है कि गुणवान कैसा है?  प्रयोग बता देता है कि परिणाम कैसा है? शिष्य बता देता है कि गुरुज्ञान कैसा है? एकाग्रता बता देती है कि ध्यान कैसा है? स्वभाव बता देता है कि मेहरबान कैसा है? प्रकृति बता देती है कि आसमान कैसा है? पुरुषार्थ बता देता है कि भाग्यवान कैसा है? भक्त बता देता है कि इस का भगवान कैसा है? द्वारा -- सरिता जैन सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका हिसार 🙏🙏🙏 विनम्र निवेदन यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नत...