यम और नचिकेता

  यम और नचिकेता की कथा : 

आत्मज्ञान और समर्पण की अनमोल यात्रा


यह कहानी कठोपनिषद से है, जिसमें ऋषि वाजश्र्वा, जो परम ज्ञानी थे, ने विश्वजीत यज्ञ किया। इस यज्ञ के द्वारा उन्हें जीवन में किसी भी प्रकार के दुःख या विषाद से मुक्ति मिलनी थी और वे हमेशा आनंदित रहना चाहते थे। 

ऋषि वाजश्र्वा ने यज्ञ के दौरान अपना सम्पूर्ण धन दान देने का संकल्प लिया था। उनके पास याचकों की लंबी कतार लगी थी, और वह लगातार अपनी संपत्ति दान करते जा रहे थे। पहले तो अच्छी चीज़ें जा रही थीं, लेकिन धीरे-धीरे केवल बूढ़ी गायें बच गईं। 

इस समय बालक नचिकेता, जो केवल 6 या 7 साल का था, यह सब देख रहा था। उसने अपने पिता से पूछा, “पिताजी, ये बूढ़ी गायें तो किसी काम की नहीं हैं, तो आप इन्हें क्यों दान कर रहे हैं?” 

ऋषि वाजश्र्वा ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैंने संकल्प लिया है कि मैं सम्पूर्ण धन दान करूंगा, इसलिए मैं इन्हें अपने पास नहीं रख सकता।” हालांकि, ऋषि ने यह नहीं सोचा कि दान हमेशा उपयोगी वस्तुओं का किया जाता है, जो दूसरों के काम आए। अनुपयोगी वस्तु दान करने से तो किसी पर बोझ ही पड़ता है।

नचिकेता के मन में एक विचार आया, कि अगर पिता ने सम्पूर्ण धन दान कर दिया है, तो वे मुझे भी दान कर देंगे। लेकिन ऐसा कोई विचार ऋषि वाजश्र्वा के मन में नहीं था। 

नचिकेता ने तीसरी बार पूछा, “पिताजी, आप मुझे किसको दान करेंगे?” 

ऋषि गुस्से में आकर बोले, “यमराज को!” 

यह सुनकर नचिकेता अपने लक्ष्य की ओर चल पड़ा, यमलोक के सफ़र पर। 

नचिकेता ने बिना किसी डर के जंगलों और पहाड़ों को पार किया। वह भूख और प्यास से बेखबर, एकमात्र उद्देश्य के साथ यमराज के पास जा रहा था। अंत में वह यमलोक पहुंच गया, लेकिन यमदूतों ने उसे अंदर नहीं जाने दिया। 

नचिकेता ने उनसे कहा, “मेरे पिता ने मुझे यमराज को दान किया है, तो मुझे यमराज के पास जाना ही होगा।” 

यमदूतों ने उसे भीतर नहीं जाने दिया, लेकिन नचिकेता ने हार नहीं मानी और यमराज के ध्यान में बैठ गया। 

तीन दिन बाद यमराज ने नचिकेता के दृढ़ निश्चय से प्रभावित होकर उसे तीन वरदान देने का वचन लिया। नचिकेता ने पहला वरदान मांगा कि उसके पिता को यज्ञ का फल मिले और वे प्रसन्न हों। यमराज ने यह वरदान स्वीकार कर लिया। 

दूसरा प्रश्न नचिकेता ने पूछा, “जो जन्मता है, उसकी मृत्यु निश्चित है, फिर देवता कैसे अजर-अमर होते हैं?” यमराज ने नचिकेता की बुद्धिमत्ता की सराहना करते हुए उत्तर दिया कि देवताओं को ऊर्जा प्रार्थनाओं से मिलती है, जो उन्हें चिरकाल तक जीवित रखती है। 

तीसरा सवाल था, “मृत्यु के बाद आत्मा का क्या होता है?” यमराज ने इसका उत्तर दिया कि मृत्यु के बाद आत्मा के कर्मों के आधार पर पुनः जन्म या मोक्ष निर्धारित होता है। 

नचिकेता के आत्मज्ञान के कारण यमराज ने उसे वरदान दिया कि वह अग्नि के नाम से जाना जाएगा। इसके बाद नचिकेता का सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर में वापस लौट आया। 

ऋषि वाजश्र्वा और अन्य ऋषिगण नचिकेता को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें गोद में उठाकर कहा, “तुम जैसे मेधावी पुत्र पाकर मेरा यज्ञ सफल हुआ। अब मुझे परमानंद की प्राप्ति हो रही है।”

द्वारा--सरिता जै

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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