ज़िन्दगी पर भरोसा नहीं

ज़िन्दगी पर भरोसा नहीं   

वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से

नहीं है भरोसा रे, ज़रा ज़िन्दगी का

मज़ा लूट बंदे, प्रभु बन्दगी का।

लगा के तू फैशन, सड़क पर निकलता,

सजा के तू तन को, क्यों है अकड़ता।

भरा है पिटारा ये - 2, इक गंदगी का,

नहीं है भरोसा रे, ज़रा........

लगाए मोहब्बत से सुन्दर बग़ीचे,

सजाए भवन जो, बिछा कर गलीचे।

 मौन जो विधि कर गढ़े,

नहीं साथ देते -2,  सदा आदमी का,

नहीं है भरोसा रे, ज़रा...........

उमर तेरी पल-पल, घटी जा रही है,

निकट मौत छिन-छिन, चली आ रही है,

समझ ले तू बंदे- 2, इशारा घड़ी का।

नहीं है भरोसा रे, ज़रा...........

चला के तू दिल में दया का फव्वारा,

दिया दीन दुःखियों को, जिस ने सहारा,

उसी का है जीवन- 2, हँसी का ख़ुशी का।

मज़ा लूट लेने, प्रभु बन्दगी का।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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