परोपकारी साधु
परोपकारी साधु
बहुत पहले की बात है। हमारे देश में एक महान् परोपकारी साधु रहता था। वह साधु सारे जगत् को भगवान् मान कर पूजता था। दुःखियों की सहायता करना, पथ भ्रष्टों को मार्ग बतलाना, अपकारियों का भी उपकार करना, उसका दैनिक कार्य था। वह पुण्य के लोभ से नहीं, बल्कि स्वभाव से ही अच्छे कार्य करता था। जिस प्रकार सूर्य स्वाभाविक गति से प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार वह भी मानवता का प्रकाश फैला रहा था।
स्वर्ग में रहने वाले देवता भी उसे दूर से ही देखकर आश्चर्यचकित थे कि इस शरीर धारी ने मृत्यु लोक में ही देवत्व कैसे प्राप्त कर लिया? वे इस महा पुरुष को पुरस्कृत करना चाहते थे। देवता रूप बदल कर उसके पास आये और कहने लगे - आप कहिए, क्या चाहते हैं? वरदान माँगिये। आपके स्पर्श से ही रोगी स्वस्थ हो जायेंगे।’’
साधु अपनी सेवा का पुरस्कार प्राप्त नहीं करना चाहता था। स्वयं में तृप्त होकर केवल अपना कर्तव्य पालन कर रहा था। उसने कहा हे देवताओं! मैं दैवी शक्ति नहीं चाहता हूँ। उसका अधिकारी तो केवल परमात्मा है। मैं अनधिकार चेष्टा नहीं करता हूँ।
देवता निराश हो गये, फिर उससे प्रार्थना करने लगे, ’’वर माँगो, जो कुछ आप चाहते हैं।’’
साधु ने कहा, ’’ईश्वर ने मुझे सब कुछ दिया है। इससे अधिक किसी प्रकार की आवश्यकता नहीं है।’’
देवताओं ने फिर कहा, ’’हम तो वरदान देने के लिए आपके पास आये हैं। अपनी इच्छा से वरदान देकर ही जायेंगे।’’
साधु थोङी देर चुप रहा और कहने लगा, ’’हे देवताओ! मैंने तो निष्काम भाव से सेवा व्रत ग्रहण किया है। कार्य करने पर मैं फल की इच्छा नहीं करता हूँ। मैं उपकार कर रहा हूँ, इस प्रकार की भावना मुझे छू भी नहीं सकती। आप मुझे शक्ति शाली बनाकर पतन की ओर मत ले जाइये।
देवताओं ने फिर कहा - जिससे तुम्हारी प्रयोजन सिद्धि हो वह वस्तु माँगिये।
साधु ने कहा - सबका कल्याण हो। आप केवल यह वरदान दीजिये। मैं परोपकार के फल का भागी नहीं होना चाहता हूँ। देवताओं ने कहा - ऐसा ही हो! जहाँ तुम्हारे शरीर की छाया भी पड़ेगी, वहाँ जीवन का संचार होगा। तुम्हें उस छाया का प्रभाव भी मालूम न होगा।’’
वरदान के बाद देवता दुन्दुभि बजाते हुए वहाँ से चले गये। साधु को इस दिव्य शक्ति का कुछ भी अभिमान नहीं हुआ। वह लोक सेवा में लग गया। दैवी शक्ति ने अपना प्रभाव दिखाना प्रारम्भ किया। जहाँ-जहाँ साधु की छाया पङती थी वहाँ-वहाँ नव जीवन का संचार होने लगा। सूखे पेड़ों के पत्ते हरे हो गये। सूखे तालाब जल से भर गये। पीड़ित प्राणी प्रसन्न हो गये। साधु नहीं जान पाता है कि यह किसके प्रभाव से हो रहा है, क्योंकि वह आगे चलता जाता था और उसकी छाया पीछे पड़ती रहती थी।।
इसलिए उसके मन में अहंकार की भावना भी प्रकट नहीं हो रही थी। उसने विनम्र भावना से सबकी सेवा की। लोगों ने उसे सिद्ध पुरुष माना। अलौकिक शक्ति वाला यह साधु निरभिमानी है। यह सोच कर सभी चकित रह गये और सभी उसके भक्त हो गये। साधु फिर भी स्वयं को सेवक ही मान रहा था।
वास्तव में लोक सेवक वे ही हैं, जो निष्काम भाव से दूसरों की सेवा करते हैं। सत्पुरुषों के शरीर से नहीं, बल्कि उनके प्रभाव से दूसरों का हित होता है। ऐसे सेवक लोग, जो सबके लिए प्रिय होते हैं, धन्य हैं। जो लोकसेवक होता है, वह स्वयं के कार्य की प्रशंसा नहीं करता।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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