Be humble

 जितने बड़े बनते जाओ उतने ही विनम्र बनते जाओ।
 Be humble as you rise more and more.

एक कहावत है कि महान व्यक्ति वह होता है जो सबका सेवक होता है। एक महान व्यक्ति तब और अधिक विनम्र होता जाता है, जब वह और अधिक धन, ताकत, पदवी और सम्मान प्राप्त करता जाता है। नाम, प्रसिद्धि, धन और ताकत पाने पर घमंड करना अहंकारी दिमाग़ के लक्षण हैं। तुम्हें भौतिक वस्तुएं जैसे नाम, प्रसिद्धि, धन और ताकत का दूसरों के सामने प्रदर्शन करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। केवल उनको भगवान को समर्पित कर दो। ये सब वस्तुएं भगवान की ओर से प्रदान की गई हैं, तुम्हारी नहीं है। घमंड और अहंकार निश्चित रूप से मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं। यह एक दैवीय नियम है और किसी को ऐसे पतन से छूट नहीं मिलती।

वृक्ष और विनम्रता

एक नदी के किनारे एक बहुत विशाल और मजबूत सागौन का पेड़ था। उसे अपनी मजबूती और ऊँचाई पर बहुत घमंड था। वह हमेशा छोटे पौधों, झाड़ियों और लताओं को नीची नज़र से देखता था और अक्सर कहता, “तुम सब कितने कमज़ोर हो, हवा के एक झोंके में झुक जाते हो। मुझे देखो, मैं कभी नहीं झुकता।” 

छोटे पौधे चुपचाप उसकी बातें सुनते और अपनी जड़ों को जमीन में गहरा जमाए रखते। 

एक दिन, भीषण आंधी आई। इतनी तेज हवा चली कि बड़े-बड़े पेड़ टूटकर गिर गए। वह अहंकारी सागौन का पेड़ भी हवा के जोर से नहीं झुक पाया और अंत में, अपनी कठोरता के कारण बीच से टूटकर नदी में गिर गया। 

वहीँ, छोटे पौधे और घास, जो झुकना जानते थे, हवा के जोर से नीचे झुक गए और सुरक्षित बचे रहे। आंधी थमी, तो वे फिर से तनकर खड़े हो गए। 

सीखः

इस लघुकथा से यह सीख मिलती है कि ’जितने बड़े बनो, उतने ही विनम्र बनो’। अहंकार मनुष्य को तोड़ देता है, जबकि विनम्रता उसे हर परिस्थिति में बचाए रखती है और ऊँचाई पर बने रहने में मदद करती है। 

चाहे तुम समाज में किसी भी पद पर विराजमान हो, तुम्हें निम्न से निम्न तथा उच्च से उच्च व्यक्ति से समान रूप से सुलभता से मिलने का प्रयत्न करना चाहिए। तुम्हें यह महसूस करना चाहिए कि दफ्तर या समाज में प्राप्त उच्च पद केवल कार्य को ठीक प्रकार से करने व कार्य का प्रबंधन करने के लिए है न कि दूसरों को दबाने के लिए। भगवान की सन्तान होने के कारण हम सब एक हैं।

उच्चता की वास्तविक भावना तुम्हें गुणों और नैतिक विशेषताओं से प्राप्त होती है न कि शक्ति या पदवी से। यह कहा जाता है कि तुम एक पद के लिए तभी योग्य हो जब तुम उस पद को पाने की भावना छोड़ देते हो। तुमने शायद यह कहावत तो सुनी होगी कि वही शासन करने योग्य है जो अनिच्छा से ताज पहनता हैं अतः अपने पद के अहंकार और उच्चता की थोड़ी सी भावना को भी मिटा दो। तुम भगवान के प्रतिनिधि की तरह भगवान की ओर से ही काम करो।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 

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