ए खुदा

  ए खुदा
वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से

ए खुदा तू बता तेरा क्या नाम है?

तू रहता है कहाँ, तेरा क्या काम है?

क्या है तेरी हकीकत, जो तू गुमनाम है?

तुझ पे खुद को छुपाने का इल्ज़ाम है।

(1)

तूने दुनिया बनाई, तू मकसद बता,

रूहें इस में बसाई, तू मतलब जता,

तेरे जलवों से रोशन, जमीं आसमान,

क्यों किसी को नज़र तू न आता यहाँ?

तेरी पर्दानशीनी का अंजाम है,

ढूंढता आज भी तुझ को इन्सान है।

(2)

धर्म मजहब में हैं तेरे चर्चे बयां,

शान में तेरे लिखते हैं पर्चे वहां,

सब के भगवान अपने, अपने ही है जहां,

नासमझ होकर जो हैं लड़ते यहां,

तू समझदार हो के भी अनजान है।

(3)

तूने जन्नत बनाने की जहमत भी की,

फिर ये दोजख को लाने की जहमत क्यों की?

खेल कैसा गजब का, जो गजब ढा दिया,

नेकियों को बदी से मिला जो दिया,

लेना तूने कहाँ तक इम्तिहान है?

यह सभी के दिलों में इक अरमान है।

ए खुदा तू बता तेरा क्या नाम है?......

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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