Be grateful to God.
अपने जीवन के हर ऐश्वर्य और आराम के लिए भगवान केधन्यवादी बनो। Be grateful to God for every luxury and comfort of your life.
इस जीवन में हम बहुत सी सुविधाओं का आनन्द लेते हैं। हम में से कई लोग अपनी मौलिक आवश्यकताओं को पूरा करने में बहुत भाग्यशाली होते हैं। उदाहरण के लिए हमें रहने के लिए एक घर, पहनने के लिए कपड़े, पीने के लिए पानी, अपने दुःख-सुख को बांटने के लिए परिवार, अपनी सामाजिक आवष्यकताओं को पूरा करने के लिए पड़ोसी, जीवन-यापन के लिए और अपने आप को व्यस्त रखने व कमाने के लिए नौकरी और 70-80 साल तक अपने कार्य कलापों को चलाने के लिए अच्छा स्वास्थ्य मिला है।
लेकिन क्या कभी हमने यह सोचा है कि किसकी कृपा से हम इन सब का आनन्द उठा रहे हैं? क्या यह हमारी शक्ति के अन्दर था या अन्य किसी व्यक्ति की ताकत का कमाल है, जिसने हमारे लिए इस पृथ्वी पर हमें लम्बे जीवनकाल तक चलने वाला इतना सामान उपलब्ध कराया? निश्चय ही नहीं। हमारी आरामदायक ज़िन्दगी के लिए यह सब जादुई तामझाम केवल भगवान के द्वारा ही बनाया जा सकता है और हमें प्रदान किया जा सकता है।
इसलिए तब क्या यह हमारा पुनीत कर्त्तव्य नहीं बनता कि हम भगवान का धन्यवाद करें और उसके आभारी बनें, जब हम उनकी कृपाओं को प्राप्त कर रहे हैं।
भगवान की कृपा और हमारा नजरिया
एक बार एक व्यक्ति समुद्र के किनारे टहल रहा था। वह बहुत परेशान था, क्योंकि उसे लग रहा था कि भगवान ने उसे जीवन में कुछ नहीं दिया। वह बुदबुदा रहा था, “हे ईश्वर! तूने मुझे न तो धन दिया, न बड़ी गाड़ी और न ही बड़ा बंगला। मेरे पास कुछ भी ऐसा नहीं है, जिसके लिए मैं तेरा धन्यवाद करूँ।”
तभी उसे वहाँ एक साधु मिले। साधु ने उसकी परेशानी पूछी। व्यक्ति ने अपनी वही शिकायतें दोहरा दीं।
साधु मुस्कुराए और बोले, “बेटा, अगर मैं तुम्हें आज एक करोड़ रुपये दूँ, तो क्या तुम मुझे अपनी दोनों आँखें दोगे?“
व्यक्ति चौंककर बोला, “बिल्कुल नहीं, महाराज! मेरी आँखें अनमोल हैं।”
साधु ने फिर पूछा, “अच्छा, अगर मैं तुम्हें पांच करोड़ दूँ, तो क्या तुम अपने दोनों हाथ और पैर दोगे?”
व्यक्ति ने तुरंत मना कर दिया, “कभी नहीं! इनके बिना मैं जीऊँगा कैसे?”
तब साधु ने शांत भाव से कहा, “सोचो, ईश्वर ने तुम्हें करोड़ों-अरबों का अनमोल शरीर मुफ्त में दिया है - आँखें दी हैं दुनिया देखने के लिए, हाथ-पांव दिए हैं मेहनत करने के लिए और साँसें दी हैं जीवित रहने के लिए। फिर भी तुम कहते हो कि उसने तुम्हें कुछ नहीं दिया?”
वह व्यक्ति अवाक् रह गया। उसे समझ आ गया कि ईश्वर की सबसे बड़ी कृपा तो हमारे पास पहले से ही है, बस! हम उसे देख नहीं पा रहे थे। उसने तुरंत हाथ जोड़कर भगवान से क्षमा माँगी और उनके आशीर्वाद के लिए धन्यवाद किया।
सीखः
शिकायत करने के बजाय हमें उन चीजों की गिनती करनी चाहिए जो हमारे पास हैं। जीवन की छोटी-छोटी सुख-सुविधाओं और स्वस्थ शरीर के लिए हमेशा भगवान का शुक्रगुजार रहना चाहिए।
वास्तव में बिना यह जाने कि इन आनन्ददायक वस्तुओं का स्रोत कौन है, यदि हम इनका आनन्द उठाते हैं, तो यह पाप है। दयालु भगवान की कृपा के विषय में सोचने का एक भी कदम उठाए बिना यदि हम इन आरामों का आनन्द उठाते रहें, तो यह एक मनुष्य होने के नाते बहुत बड़ा स्वार्थ, पशुता और हमारी ओर से अशोभनीय कार्य होगा। प्रत्येक को अपने जीवन में मिलने वाले और आनंद देने वाले छोटे से छोटे आराम और ऐष्वर्य के लिए भगवान का सतत आभार मानना चाहिए।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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