Don’t fight over religions
धर्म के लिए मत लड़ो, सभी धर्म अच्छे हैं।Don’t fight over religions, all religions are good.
दूसरों के धर्म पर अपने धर्म की बेहतरी स्थापित करने की कोशिश न करो। सभी धर्म अच्छे होते है। ये सब तुम्हें भगवान तक ले जाने के अलग-अलग रास्ते हैं। इसी प्रकार सभी गुरु महान हैं। वे सब तुम्हें अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए आवश्यक सीख और रास्ता दिखाने वाले शिक्षक हैं। अतः अन्त में लक्ष्य समान है, केवल रास्ते और गुरु
अलग-अलग हैं। जो भी तुम्हें सुविधाजनक लगे उसे चुन सकते हो, लेकिन सभी धर्मों और गुरुओं के प्रति समान आदर की भावना रखो।
उच्च स्तर के सभी संत और गुरु समान बन जाते हैं। वहां कोई अन्तर नहीं रहता। अतः एक दूसरे पर महत्ता स्थापित करने और अनावश्यक तुलना करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। जो धर्मों की तुलना करके लड़ता है उससे अधिक अधार्मिक व्यक्ति कोई नहीं है।
एक ही पानी, अलग-अलग बर्तन
एक समय की बात है, एक शहर में एक बहुत ज्ञानी साधु आए। उनके आश्रम में अक्सर धर्मों को लेकर बहस होने लगी। हिंदू, मुसलमान, ईसाई और सिख, सभी मानते थे कि उनका धर्म ही सर्वोच्च है।
एक दिन, साधु ने एक अनोखा तरीका अपनाया। उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, “बगीचे से एक-एक करके 4-5 अलग-अलग आकार के बर्तन - जैसे मटका, सुराही, कटोरा और लोटा ले आओ।“
शिष्य बर्तन ले आए। साधु ने सबको उन बर्तनों को एक साथ रखने को कहा। फिर, उन्होंने पास के कुएं से पानी भरकर हर बर्तन में थोड़ा-थोड़ा पानी डाल दिया।
साधु ने पूछा, “शिष्यगण! बताइए, मटके में कैसा पानी है?“
शिष्य बोले, “ठंडा पानी।“
साधु ने फिर पूछा, “सुराही में?“
शिष्य, “सुराही में भी वही ठंडा पानी है।“
साधु ने, “लोटा और कटोरा का क्या हाल है?“
शिष्य, “गुरुजी! सब में एक ही कुएं का पानी है।“
तब साधु ने मुस्कुराते हुए समझाया, “बच्चों! इस पानी को ’ईश्वर’ या ’सत्य’ समझो और इन बर्तनों को ’धर्म’। जैसे पानी एक ही है, लेकिन अलग-अलग बर्तनों (हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई) के कारण हमें उनके रूप अलग-अलग दिखते हैं, वैसे ही धर्म अलग-अलग रास्ते हैं, पर मंजिल एक ही है - ईश्वर।“
“सब धर्म अच्छी बातें सिखाते हैं - प्रेम, दया और भाईचारा। इसलिए धर्म पर लड़ना मूर्खता है। पानी की तरह, धर्म का उद्देश्य भी जीवन में शांति और शीतलता फैलाना है।“
सीखः धर्म मनुष्य को इंसान बनाने का एक जरिया है, भेदभाव करने का नहीं। सभी धर्म प्रेम और भाईचारे का ही मार्ग दिखाते हैं।
किसी विशेष धर्म या मत के प्रति मतान्ध होना अपने मन-मस्तिष्क के आगे अवरोधक रखने के समान है जो एक विशेष सीमा के आगे नहीं देख सकता। जब तक तुम अपने मन को विशाल नहीं बनाओगे, तुम अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचने की उम्मीद नहीं कर सकते। तुम अपनी यात्रा एक विशेष बिंदु पर आ कर रोक दोगे और आगे नहीं बढ़ सकोगे।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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