Don’t always misunderstand others.

 दूसरों को हमेशा ग़लत मत समझो।
 Don’t always misunderstand others.

कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो हमेशा दूसरों को ग़लत समझते हैं। वे हमेशा यह महसूस करते हैं कि अन्य व्यक्तियों के कार्यों का उद्देश्य केवल उन्हें हानि पहुँचाना और उनका अपमान करना ही है। उनके काम के लिए कोई छोटी-सी सलाह देना या टिप्पणी करना, उन्हें व्यक्तिगत अपमान और आलोचना दिखाई देता है। प्रत्येक बातचीत बहस के लिए चुनौती प्रतीत होती है।

वास्तव में प्रत्येक अनजान या नई वस्तु को ख़तरे की आशंका से समझना हमारी असामान्य प्रकृति की मौलिक भावनाओं में से एक है।

महर्षि पतंजलि ने अपने ‘योग शास्त्र’ में भी कहा है ‘मन का स्वभाव है- संदेह करना।’ लेकिन ठीक ध्यान व उचित ज्ञान के द्वारा इस स्वाभाविक कमज़ोरी पर विजय प्राप्त की जा सकती है और इसे दूर किया जा सकता है। यदि हम इस पर गहराई से चिन्तन करें तो हमें पता चलेगा कि यह सबको ग़लत समझने की भावना दूसरों से अलग हो जाने की भावना के कारण पनपती है। हम महसूस करते हैं कि हम बाकी दुनिया से अलग हैं और इसलिए सारी दुनिया दुश्मन की तरह लगती है और हमें अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए सुनिश्चित होने के लिए एक सतत युद्ध का जोख़िम उठाना पड़ता है। लेकिन क्या ऐसा है?

वास्तविकता यह है कि हम एक दूसरे से अलग नहीं हैं। हम सब जुड़े हुए हैं और सारी रचना का अभिन्न अंग हैं। हमारी आवष्यकता और उद्देश्य सांझे हैं। वे बिन्दु, जिन पर अन्तर हैं, वे बहुत कम हैं, जब कि जिन बातों पर हम सहमत हैं, वे अधिक हैं। इसलिए ग़लतफहमियों का अवसर कहां हैं?

आधे गिलास का सच 

राघव बहुत जल्दी दूसरों को जज कर लेता था। उसके लिए, जो उसके नजरिए से अलग है, वह व्यक्ति गलत ही है। एक दिन, राघव को ऑफिस की एक जरूरी रिपोर्ट सुबह 10 बजे तक सबमिट करनी थी। सुबह 9ः30 बजे उसने अपने सहकर्मी सुमित को देखा, जो इत्मिनान से चाय पी रहा था। राघव ने तुरंत सोच लिया, “सुमित कितना गैर-जिम्मेदार है! इतना काम बाकी है और इसे चाय की पड़ी है। जरूर इसकी रिपोर्ट अधूरी होगी और कल बॉस से डांट खाएगा।” 

राघव ने रिपोर्ट जमा की और सुमित की शिकायत करने बॉस के पास चला गया। पर जब बॉस ने दोनों की फाइलें खोलीं, तो सुमित की रिपोर्ट न केवल पूरी थी, बल्कि उसने राघव से बेहतर प्रेजेंटेशन बनाई थी। 

राघव हैरान रह गया। बॉस ने सुमित की तारीफ की।

बाहर आकर राघव ने पूछा, “सुमित, तुमने तो सुबह खाली बैठ कर चाय पीने के मजे लिए थे, फिर इतनी अच्छी रिपोर्ट कब तैयार की?” 

सुमित मुस्कुराया, “दोस्त! रात को मैं 2 बजे तक काम कर रहा था। सुबह दिमाग फ्रेश करने के लिए चाय पीना मेरी आदत है। मेहनत का मतलब सिर्फ सिर पकड़कर बैठे रहना नहीं है, समय पर काम समाप्त करना भी है।” 

राघव को समझ आ गया कि उसने केवल आधी तस्वीर देखी थी और गलतफहमी के आधार पर सुमित को गलत समझ लिया था। 

सीखः

सच्चाई अक्सर वैसी नहीं होती जैसी हमें पहली नज़र में दिखाई देती है। किसी के बारे में राय बनाने से पहले पूरी बात जानना जरूरी है। दूसरों को गलत समझने से बेहतर है, उन्हें समझने की कोशिश की जाए। 

अतः दूसरों के साथ इस धारणा के साथ बातचीत प्रारम्भ मत करो कि सामने वाला व्यक्ति तुम्हारा शत्रु है और तुम्हें हानि पहुँचाना चाहता है, बल्कि तुम्हें बातचीत का प्रारम्भ इस धारणा से करना चाहिए कि दूसरा व्यक्ति बहुत अच्छा है और कोई भी चाहकर जानबूझकर कोई गलत काम नहीं करेगा। यदि वह अपने कार्यों से अपने आप को ग़लत या बुरा सिद्ध करता है, केवल तभी तुम्हें अपनी धारणा बदलनी चाहिए।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 





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