Don't make catastrophe
Don't make catastrophe out of unpleasant events of life.जीवन की अप्रिय घटनाओं को बड़ी आफ़त न बनाओ।
हमारे जीवन में बहुत सी अप्रिय घटनाएं घटित होती हैं लेकिन वे हमें अव्यवस्थित (upset) नहीं कर सकती, जब तक हम अपने आप से निम्नलिखित बातें कर के उन्हें बड़ी आफ़त नहीं बना लेते-
1) यह मेरे जीवन की बहुत महत्त्वपूर्ण घटना है, इसलिए इसके बारे में मुझे अवश्य चिन्तित होना चाहिए।
2) जीवन में केवल यही एक दुर्घटना है, इसलिए मुझे इस पर लगातार सोचना चाहिए।
3) यही संसार का अन्त है।
4) यह जीवन और मृत्यु वाली परिस्थिति है।
5) दुनिया समाप्त होने जा रही है।
या इसी प्रकार का कोई अशुभ विचार।
लेकिन क्या ऐसा है? क्या जीवन में कोई घटना वास्तव में इतनी महत्त्वपूर्ण या भयानक हो सकती है? हज़ारों ज्ञान प्राप्त व्यक्तियों के अनुभव, जिन्होंने जीवन के कई तूफ़ानों का सामना स्वयं किया था, यह दिखाते हैं कि इस जीवन में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे आफ़त या असहनीय कहा जा सके। प्रत्येक घटना को शांति से स्वीकार किया जा सकता है। किसी बुरी घटना से अपरिहार्य संबंध दिखाना और उसका उपचार करने का साधन जुटाना ठीक है लेकिन आवष्यकता से अधिक सम्बद्धता और अति व्याकुलता समस्या ही पैदा करती है।
बात का बतंगड़
एक छोटे से गाँव में सुधीर और मोहन नाम के दो पड़ोसी रहते थे। दोनों में अच्छी दोस्ती थी, लेकिन गाँव के ही कुछ लोगों को उनकी यह दोस्ती खटकती थी।
एक दिन सुधीर अपनी छत पर खड़ा था। उसने देखा कि मोहन के आँगन में एक कुत्ता मरा पड़ा है। सुधीर ने हमदर्दी में अपने दूसरे पड़ोसी रमेश से कहा, "रमेश भाई, देखो! मोहन के आँगन में आज एक बेचारा कुत्ता मर गया है, बेचारा मोहन बहुत दु:खी होगा।"
रमेश ने यह बात तीसरे पड़ोसी सुरेश को बताई, "अरे सुना तुमने? मोहन के घर में आज एक कुत्ता मरा है, सुधीर कह रहा था कि मोहन शायद बहुत परेशान है।"
सुरेश ने इसे और नमक-मिर्च लगाकर आगे बढ़ाया, "भाई, मोहन के घर में तो कुछ अनहोनी हो गई है! सुना है वहाँ खून-खराबा हुआ है और सुधीर बहुत डरा हुआ है।"
शाम होते-होते खबर पूरे गाँव में फैल गई कि मोहन ने अपने घर में किसी का कत्ल कर दिया है और सुधीर चश्मदीद गवाह है। गाँव वाले लाठी-डंडे लेकर मोहन के घर पहुँच गए।
मोहन हैरान-परेशान बाहर आया। जब उसे पता चला कि मामला क्या है, तो उसने सबको अंदर बुलाया। वहाँ कोने में एक पुराना, फूला हुआ प्लास्टिक का खिलौना-कुत्ता पड़ा था, जिसे पड़ोस के बच्चों ने खेल-खेल में फाड़ दिया था। सुधीर ने दूर से उसे ही असली कुत्ता समझ लिया था।
सुधीर को अपनी गलती का एहसास हुआ और गाँव वालों को भी समझ आया कि कैसे एक छोटी-सी गलतफहमी 'बात का बतंगड़' बन गई थी।
सीख: बिना सोचे-समझे और बिना पुष्टि किए किसी भी बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए, क्योंकि तिल का ताड़ बनने में देर नहीं लगती।
यह तभी होता है, जब हम घटनाओं को अकारण गंभीरता से सोचने लगते हैं और उन्हें अधिक महत्त्व देने लगते हैं, जितना उन्हें देना चाहिए। इसीलिए वे हमें दबाना शुरू कर देती हैं। किसी बात को उतना ही महत्त्व देना चाहिए, जितने की वह पात्र है। यदि तुम किसी घटना को विशाल दृष्टिकोण से देखना सीख लो, तो तुम पाओगे कि ये घटनाएं उतनी भयावह नहीं हैं, जितनी संकुचित दृष्टिकोण से देखने पर तुमने कल्पना की थी। इसलिए अगली बार जब तुम जीवन में किसी घटना से बेचैन हो जाओ, तो केवल अपने आप से पूछो कि क्या यह घटना वास्तव में इतनी महत्त्वपूर्ण या आपत्तिजनक है, जिसने तुम्हें इतना बेचैन कर दिया? क्या यह तुम्हारे जीवन की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना है? तुम पाओगे कि इस प्रश्न से और चुनौती से उस अवांछित पीड़ा से तुम्हारा मन भार-मुक्त हो गया है।
जैसा पहले बताया गया है, बातों को गंभीरता से या भावनात्मकता से लेने पर हमारे अवचेतन मन पर गहरा प्रभाव बन जाता है। यह प्रभाव भविष्य में उसी परिस्थिति का सामना होने पर हथियार डालने के लिए विवश कर देता है। अतः जीवन में प्रत्येक स्थिति का सामना अधिक भावनात्मक रूप से जुड़े बिना करने का प्रयत्न करना चाहिए, ताकि कोई संस्कार या प्रभाव आपके अवचेतन मन पर न पड़े।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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