Learn to give up

 ख़ुशी प्राप्त करने के लिए बेकार के विचारों को छोड़ना सीखो और जाने दो। 
Learn to give up & let go.

कुछ लोग सोचते हैं कि किसी के विकास और ख़ुशी का रास्ता जितनी संभव हो सके उतनी अधिक से अधिक वस्तुएं इकट्ठी करना, जीवन में जितना संभव हो सके अधिक से अधिक लोगों के साथ संबंध रखना, जितना संभव हो उतनी नौकरियां या काम बदलना, जहां तक हो सके अधिक से अधिक स्थानों पर घूमने जाना है। लेकिन ऐसे लोग जब अपने जीवन के अन्तिम भाग में पहुँच कर अतीत पर दृष्टि डालते हैं तो उन्हें आश्चर्य होता है कि वे किस लिए इतनी भागदौड़ कर रहे थे।

वास्तव में सत्य यह है कि ख़ुशी वस्तुओं या विचारों को इकट्ठा करने में नहीं, बल्कि छोड़ने और जाने देने में है। जितना अधिक तुम छोड़ोगे, उतनी ही अधिक शांति और हल्कापन अनुभव करोगे।

यहाँ एक लघुकथा है जो जीवन के दृष्टिकोण को बदलने का संदेश देती है:

चाय का कप और समझदार बुजुर्ग

एक युवक अपनी नौकरी में आई एक छोटी-सी समस्या को लेकर बेहद परेशान था। उसे लग रहा था कि उसका करियर खत्म हो गया है और जीवन में अब सब कुछ बर्बाद हो गया है। वह रोता हुआ अपने दादाजी के पास गया और अपनी आपबीती सुनाई।

दादाजी ने शांति से उसकी बात सुनी, फिर उसे रसोई में ले गए। उन्होंने एक कप में थोड़ी चाय ली और उसमें एक बड़ा चम्मच नमक डाल दिया। फिर उन्होंने युवक से वह चाय पीने को कहा।

युवक ने चाय पी और तुरंत थूक दी, "दादाजी, यह बहुत कड़वी और नमकीन है!"

दादाजी मुस्कुराए, "ठीक है, अब मेरे साथ बाहर आओ।"

वे पास की एक झील के किनारे पहुंचे। दादाजी ने एक मुट्ठी नमक झील में डाल दिया और कहा, "अब झील का पानी पियो।"

युवक ने झील का पानी पिया।

दादाजी ने पूछा, "क्या अब भी इसका स्वाद नमकीन लगा?"

"नहीं," युवक ने कहा।

"क्या तुम्हें नमक का स्वाद आया?"

"बिल्कुल नहीं," युवक ने उत्तर दिया।

दादाजी ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, "बेटा, जीवन की अप्रिय घटनाएं (कठिनाइयां) नमक की तरह हैं, न कम, न ज्यादा। लेकिन उस नमक का स्वाद इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसे किस 'पात्र' में डालते हैं।

युवक, यदि तुम एक 'कप' (संकुचित सोच) बनोगे, तो छोटी-सी समस्या तुम्हें कड़वी लगेगी। यदि तुम 'झील' (विशाल सोच) बनोगे, तो वही समस्या तुम्हारे जीवन के विशाल अनुभव में घुल जाएगी और तुम्हें परेशान नहीं करेगी।

सीख: अपनी समस्याओं को बड़ा बना-बनाकर सिर पर न बिठाओ। अपनी सोच का दायरा बढ़ाओ, फिर कोई भी मुसीबत तुम्हें 'आफत' नहीं लगेगी।


जब तुम हर वस्तु को जाने दोगे, तुम पूर्णतया स्वतंत्र हो जाओगे। इस ‘जाने दो’ का यह अर्थ नहीं है कि अपनी सब वस्तुओं को फेंक दो या छोड़ दो। तुम सब वस्तुएं रख सकते हो लेकिन फिर भी तुम मानसिक रूप से असम्बद्ध रह सकते हो। यह सही अर्थों में छोड़ना होता है। यह स्थिति केवल भौतिक वस्तुओं और संबंधों पर ही लागू नहीं होती बल्कि तुम्हारे मन में जड़ बनाए बैठी विभिन्न भावनाओं के सन्दर्भ में भी लागू होती है।

उदाहरण के लिए मान लो तुम्हारे मन में कुछ विशेष बातों के संबंध में कुछ व्याकुलताएं हैं, कुछ ईर्ष्याएं हैं और किसी विशेष व्यक्ति के प्रति घृणा है। इन भावनाओं को एक पत्थर की तरह बस पानी में डाल दो और अपने आप को आज़ाद करो।

कुछ बातों से चिपकने से तनावपूर्ण बेचैनी होती है जब कि उन्हें छोड़ने से शान्ति और आराम की भावना आती है। जब कुछ विशेष बातों से तुम जुड़ते हो या टकराते हो, तुम्हारे विचारों और कार्यों की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है और तुम उन सम्बन्धित बातों के अनुसार ही इस दुनिया में सोचने और काम करने लग जाते हो। इस प्रकार वास्तविकता से अनजान होने के कारण वे तुम्हें बेचैन और चिड़चिड़ा बना देती हैं।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 

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