अंधेरी रात
अंधेरी रात
सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा
रात बनी काली नागिन, यह मुझको डसने आई है,
लहराती और बल खाती यह मुझमें बसने आई है।
(1)
कहाँ गए वो सोने से दिन, और चाँदी सी रातें,
मेरा मन बहलाती थीं जब मीठी-मीठी बातें;
अब तो मन बहलाने को मैं और मेरी तन्हाई है,
रात बनी..........।
(2)
जीवन इक सपना-सा लगता, आँख खुली और टूट गया,
चला साथ जो अब तक मेरे, पल भर में ही छूट गया।
सपना तो सच हुआ नहीं, यह विरह बना सच्चाई है,
रात बनी..........।
(3)
इस मतलब की दुनिया में, देखा यह गोरख धन्धा है,
अपने-अपने सुख पाने को, व्याकुल हर इक बंदा है;
बीती बातें याद करूँ तो, आती मुझे रुलाई है,
रात बनी..........।
(4)
जाने कब होगा प्रभात और फिर से चिड़ियां चहकेंगी,
मेरे मन की बगिया जाने, कब फूलों से महकेगी;
राग मिलन का सुना नहीं] विरहा की गज़ल सुनाई है,
रात बनी..........।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
विनम्र निवेदन
यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।
धन्यवाद।

Comments
Post a Comment