खुशी के स्रोत का ज्ञान होना
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Tips of Happiness
जानें कुछ व्यवहारिक सूत्र (4)
काश! हमने ऐसा न किया होता या ऐसा न कहा होता तो आज हमें यह दिन न देखना पड़ता।
यदि गहराई से सोचा जाए तो एक दिन के बाद ‘आज’ (Today) भी ‘कल’ अर्थात् Yesterday में बदलने वाला है। यदि हम अपने ‘आज’ को संभाल लें तो ‘कल’ (Tomorrow) हमें यह नहीं कहना पड़ेगा कि काश! कल हम ऐसा न कहते या करते। हम समझ चुके हैं कि खुशी मिलेगी तो वर्तमान में ही मिलेगी, भूतकाल या भविष्य में नहीं।
आने वाले कल की खुशी का आधार भी आज ही बनेगा जो अभी हमारे हाथ में है।
प्रश्न उठता है कि खुशी वर्तमान में तो मिलेगी, पर कहाँ से ढूँढ कर लाएं? घर में, मन्दिर में, बाज़ार में, व्यापार में - हर जगह देख ली, हमें तो आज तक खुशी कहीं मिली नहीं।
आप कहोगे कि चलो! सब मिलकर खोजते हैं, लेकिन यह आपकी भूल है।
वास्तव में खोजा तो उसे जाता है जो कहीं खो गया हो।
हम खुशी को खोजने निकल भी पड़ें तो जाएंगे कहाँ? शायद भौतिक सुखों में या बेटों-पोतों में या नाते-रिश्तेदारों में या धन-दौलत में।
‘जाएं तो जाएं कहाँ?’
इन बाह्य-साधनों में ही खुशी मिलती तो वैभवशाली राजा इतनी धन-सम्पत्ति छोड़ कर वनों में तपस्या करने और शाश्वत खुशी की तलाश में क्यों जाते? वे जानते थे कि शाश्वत सुख व आनन्द इन्हें छोड़ने में है न कि पाने में। उन्हें मालूम था कि खुशी की ओर जाने वाला रास्ता कौन-सा है?
एक आदमी को रेलवे-स्टेशन जाना था और वह रिक्शा की इंतज़ार में सड़क के किनारे खड़ा था। तभी उसे एक रिक्शावाला रिक्शा लेकर आता हुआ दिखाई दिया।
आदमी ने उससे पूछा - ‘भाई! रेलवे-स्टेशन चलोगे क्या?’
‘हाँ जी! चलूँगा।’
‘कितने पैसे लोगे?’
‘साहब! 20 रुपए लगेंगे।’
‘भाई! 20 रुपए तो ज़्यादा हैं। 15 रुपए लेने हों तो बताओ।’
रिक्शावाले ने 15 रुपए में ले जाने को मना कर दिया तो वह आदमी पैदल ही आगे की ओर चल पड़ा। जैसा प्रायः देखा जाता है, वह रिक्शावाला भी उसके पीछे-पीछे अपनी खाली रिक्शा लेकर आने लगा। उसे उम्मीद थी कि कभी तो यह आदमी थककर मेरी रिक्शा में बैठने के लिए कहेगा।
वही हुआ। रेलवे-स्टेशन तो आने का नाम ही नहीं ले रहा था। आदमी की सांस फूलने लगी थी। हल्का-सा बैग भी उठाना मुश्किल लगने लगा। तभी उस आदमी ने पीछे मुड़कर देखा तो वही रिक्शावाला दिखाई दिया।
उसने पूछा - ‘क्यों भाई! क्या ख्याल है? रेलवे-स्टेशन चलना हो तो बताओ, अब तुम्हें यहाँ दूसरी सवारी नहीं मिलेगी। वैसे भी तो खाली ही चल रहे हो।’
‘हाँ साहब! मेरा तो काम ही यही है। पर पहले बता दूँ कि यहाँ से रेलवे-स्टेशन जाने के 30 रुपए लगेंगे।’
आदमी हैरान हो गया।
‘अरे भाई! कमाल करते हो! अब तो मैं आधी दूर आ भी चुका हूँ। यहाँ से तो 10 रुपए लगने चाहिए न!’
रिक्शावाले ने विनम्रता से जवाब दिया - ‘साहब! आप आधी दूर आ तो गए हो पर विपरीत दिशा में चल रहे हो। यहाँ से स्टेशन की दूरी और भी बढ़ गई है।’
क्या यही दशा हमारी नहीं है?
हम भी तो खुशी को पाने के लिए विपरीत दिशा में चल रहे हैं और परिणामस्वरूप वह हमसे उतनी ही अधिक दूर होती जा रही है। खुशी का खज़ाना तो हमारे भीतर है और हम खोज रहे हैं - बाहर। जिस खुशी को हम बाहर की सुख-सुविधाओं में पाना चाहते हैं, उस का पता तो हमारे भीतर ही मिलेगा। भौतिक वस्तुओं में खोजते-खोजते तो वह हम से और भी दूर होती जाएगी।
एक ऐशो-आराम का साधन अन्य 10 इच्छाओं को जन्म देने वाला होता है, जो कभी पूरी नहीं हो सकती।
वास्तविक खुशी इच्छाओं को कम करने में है, न कि उनको पूरा करने में। असली खुशी तो हमारे मन में छिपी हुई है, उसे बाहर प्रगट होने दो।
आपने कोई अनगढ़ पत्थर देखा होगा लेकिन एक शिल्पकार ही जान सकता है कि उसमें भगवान की मनोरम प्रतिमा छिपी हुई है। यदि कुशल शिल्पकार छैनी-हथौड़े की सहायता से उसके फालतू पत्थर को खोद-खोद कर बाहर निकाल देता है तो उस में से भगवान की सुन्दर, आकर्षक प्रतिमा प्रगट हो जाती है।
इसी प्रकार हम मन के मन्दिर से फालतू विचारों को खोद-खोद कर बाहर निकाल दें तो उस में से खुशी की मनोहारी प्रतिमा प्रगट हो जाएगी, इसमें कोई सन्देह नहीं है।
कहा भी गया है -
जिसको ढूंढ रहे थे जग में, छिपा हुआ वो मेरे मन में,
मुझे मिला खुशी का भण्डार, मन के मन्दिर में।
मुझे मिल गई खुशी अपार, मन के मन्दिर में।
मुझे मिल गया सच्चा प्यार, मन के मन्दिर में।
अतः यह तो तय है कि खुशी को खोजना नहीं है, अपने भीतर से खोद कर निकालना है। बाहर दिखाई देने वाले भौतिक साधन, बेटे-पोते, नाते-रिश्तेदार, धन-दौलत अस्थाई खुशी का माध्यम तो हो सकते हैं, पर शाश्वत खुशी का साधन नहीं बन सकते। इनके द्वारा प्राप्त खुशी अधिक समय तक टिकने वाली नहीं है।
अतः जीवन के हर पल को मुस्कान के माधुर्य से भर दें, ताकि आपका अस्तित्व सूखा बाँस नहीं, सुख की बाँसुरी बन सके और सुनाती रहे हमें सुख, शांति और आनन्द का मधुर संगीत।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
very good
ReplyDeleteNice storis
om shanti sritaji
Thanks for appreciation 🙏🙏
DeleteThanks sarita ji for the deep knowledge
ReplyDeleteThanks for appreciation 🙏🙏
DeleteThanks sarita ji for the deep knowledge
ReplyDeleteThanks for appreciation 🙏🙏
Deleteसत्य की खोज
ReplyDeleteवास्तव में हमारी सोच ही हमें ख़ुशी दे सकती है, और कोई इसके लिए जिम्मेदार नहीं है।🙏🙏🙏
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