क्षणिकाएँ
क्षणिकाएँ
वेद प्रकाश गावड़ी, (सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापक), हिसार की लेखनी से
रिश्तों और रास्तों के बीच एक अजीब रिश्ता होता है,
कभी रिश्तों में रास्ते मिल जाते हैं
कभी रास्तों में रिश्ते बन जाते हैं
इसलिए चलते रहिए, रिश्ते निभाते रहिए
ख़ुशियाँ तो चन्दन की तरह होती हैं
दूसरों के माथे पर लगाएंगे तो,
अपनी अंगुलियाँ भी महक जाएंगी।
यह शाश्वत सत्य है।
फ़िक्र और ज़िक्र
ज़िन्दगी हमने गुज़ार दी बच्चों की फ़िक्र करने में,
अब बच्चे व्यस्त हैं हमारी कमियों का ज़िक्र करने में,
पता नहीं बुरे हम हैं, या ज़माना हमारी नज़र में,
फिर भी कोशिश करते हैं,
घर के मसले निपट जाएं, घर की घर में।
पर ऐसा लगता नहीं - वेद गावड़ी
निरोगता का सूत्र
धन खर्चियां गल बणदी नाहीं
भावे लखा दे टीके लवाइए
डाकटरां कोल गयां वी गल बणदी नाहीं
भावे देश विदेश घुमाइए
मन्नता मनियां वी गल बणदी नाहीं
भावे मन्दिरा तीर्थां ते घुम-घुम आइए
टोणे टोटकियां नाल वी गल बणदी नाहीं
भावे मढ़ी मसाणां ते मथे घसाइए
गल बणेगी उदों सजना,
करिए परहेज़ ते स्वादा नू मार मुकाइए।
ज्ञान बिना
ज्ञान बिना गल बणदी नहीं, भावें ग्रन्थ पोथियां पढ़िए
ध्यान बिना वी गल बणदी नहीं, भावें सौ सौ पौड़ियां चढ़िए
धारणा बिना वी गल बणदी नहीं, भावें दिन रात सतसंग करिए
सेवा बिना वी गल बणदी नहीं, भावें लखां दान पुन करिए
गल बणेगी ओदो सजना, जदों लड़ एक रब्ब दा फड़िए।
तू ज़िन्दगी को जी, समझने की कोशिश मत कर
वक्त के साथ तू भी चल, वक्त को बदलने की कोशिश मत कर
दिल खोल कर सांस ले, घुट घुट कर जीने की कोशिश मत कर
जो तेरे बस में नहीं, उसे भगवान पर छोड़ दे
तू
ख़ुद सुलझाने की कोशिश मत
कर।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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