Don’t think or speak ill

 किसी के लिए बुरा न सोचो, न बोलो।
Don’t think or speak ill about anybody.

विचार बहुत प्रभावशाली हथियार हैं। जब तुम किसी व्यक्ति के लिए बुरा बोलते या सोचते हो, तो तुम केवल उसी व्यक्ति को हानि नहीं पहुँचाते, बल्कि उन नकारात्मक तरंगों से अपने आप को भी अस्थाई रूप से नकारात्मक ऊर्जा प्रदान करते हो और इसीलिए अपने आप को हानि पहुँचाते हो। तुम विचारों द्वारा दूसरे को हानि पहुँचा कर कर्म के नियम के अनुसार स्वयं को दंडित करते हो।

जैसा बोओगे, वैसा काटोगे 

एक शहर में सोहन नाम का एक व्यक्ति रहता था। वह स्वभाव से बहुत ईर्ष्यालु था। उसके पड़ोस में मोहन नाम का एक हंसमुख और मेहनती व्यक्ति रहता था। मोहन की तरक्की देखकर सोहन हमेशा जलता रहता था। सोहन के मन में हमेशा यह विचार आता था कि कैसे मोहन का कोई काम बिगड़ जाए या उसे नुकसान हो।

एक दिन, सोहन ने मोहन को नुकसान पहुँचाने के लिए एक योजना बनाई। उसने मोहन के घर के सामने वाली गली में कुछ कंकड़ और कीलें बिखेर दीं, ताकि जब मोहन सुबह अपनी गाड़ी लेकर निकले, तो उसका टायर पंक्चर हो जाए।

अगली सुबह, जब सोहन उठा, तो उसने देखा कि मोहन की गाड़ी वहां नहीं थी। वह खुश हो गया कि उसका प्लान काम कर गया। लेकिन तभी, उसने देखा कि भीड़ उसके अपने घर के सामने जमा थी। उसने पास जाकर देखा तो दंग रह गया। कंकड़ और कीलें, जो उसने मोहन के लिए बिछाई थीं, सोहन की खुद की गाड़ी के नीचे आकर उसके टायर को चीर चुकी थीं।

सोहन अपनी ही बिछाई चाल में फंस गया था। तभी उसने पास के एक बुजुर्ग को कहते सुना, “बेटा, जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, वह खुद ही उसमें गिरता है।“

सोहन को अपनी गलती का एहसास हो गया। उसने समझ लिया कि दूसरों के लिए बुरा सोचने से पहले, हमें यह याद रखना चाहिए कि कर्म लौटकर हमारे पास ही आते हैं।

सीखः किसी के लिए बुरा न सोचो, क्योंकि अच्छी सोच और अच्छे कर्म ही जीवन में सुख और शांति लाते हैं। कोई व्यक्ति जो अच्छा या बुरा करता है उसके अनुसार वह

अपने आप सुख या दुःख पाएगा। तुम उसके लिए परेशान क्यों होते हो। परन्तु निश्चय ही यदि किसी व्यक्ति के ग़लत काम तुम्हारी उन्नति में बाधक हैं या बड़े पैमाने पर समाज को हानि पहुँचा रहे हैं, तो अवश्य ही तुम्हें समाज के हित के लिए कुछ प्रतिक्रिया करनी होगी। लेकिन उस व्यक्ति के विरुद्ध बिना किसी बुरी भावना के तुम यह काम कर सकते हो, बल्कि उसे अपने आप को सुधारने का अवसर दे कर अच्छी भावना भा सकते हो।

यह भी कहा जाता है कि तुम तब तक किसी में वे दोष नहीं देख सकते, जब तक वही दोष तुम्हारे अन्दर कुछ अंशों में विद्यमान न हों।

अन्य शब्दों में- दूसरों के अन्दर देखे गए दोष तुम्हारी अपनी कमियों का प्रतिबिम्ब हैं। यह दृष्टिकोण इस दार्शनिकता पर आधारित है कि बाहरी दुनिया जो हम देखते हैं, वह हमारी मानसिक स्थिति या आन्तरिक दुनिया की परछाई है। संसार स्वयं न तो बुरा है और न अच्छा।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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