एक कली मुस्काई

 एक कली मुस्काई  (15.4.2016)

सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा


प्रेरणा स्रोत -  मेरे आँगन में लगी मोतिया की बेल मेरे लिए संदेशा लाई। पहले दिन उसमें कलियां बनी, दूसरे दिन वे कलियां सुगन्धित फूल में परिवर्तित हो गई, तीसरे दिन वे फूल पीले पड़ने लगे और चौथे दिन झरने लगे। क्या बेटियों का जीवन भी इसी तरह खिल कर बिखर जाने के लिए है?

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एक कली सुन्दर बगिया में, फिर से मुस्कुराने लगी।

हंसते-हंसते फूल बनी और, बगिया को महकाने लगी।।

भौरें भी मंडराने लगे और, मीठी तान सुनाने लगे।

मधुर-मधुर संगीत सुना कर, उसका मन बहलाने लगे।।

बढ़े सभी के हाथ, उसे अपना बनाने के लिए।

अपने सूने आँगन की, बगिया में सजाने के लिए।।

तभी माली ने चुन-चुन कर, सब फूलों का इक हार बनाया।

चला भेंट करने राजा को, उसके महलों में सजवाया।।

फूल भी अपनी किस्मत पर, रह-रह कर इतराने लगा,

कुछ शरमाने कुछ सकुचाने, मन ही मन मुस्काने लगा।।

बुनने लगा महकते सपने, पर मन ही मन घबराने लगा।

अपनी शीतल सुरभि से वह, राजमहल दमकाने लगा।।

पर कुछ जल्लादी हाथों ने, उसको माला से अलग किया।

रौंदा, कुचला और मसल-मसल कर, पुष्प का सौरभ नष्ट किया।।

वह नन्हीं कली कब तक सहती, अपना ग़म किसको कहती।

दिन-रात आंसुओं की वर्षा में, कागज़ कश्ती सी बहती रहती।।

माली ने उसका रुदन सुना, पर कहाँ कहीं कुछ कर पाया?

उसको पुनः सुगन्धित करने, आकर मस्तक सहलाया।।

नई चेतना, नई जागृति, उसके मन में जाग गई।

जीवन की सच्चाई जानी, सारी दुविधा भाग गई।।

सुरभि का भंडार है तू, इस चेतन का शृंगार है तू।

दुनिया वालों से क्या डरना! मधुरिम रस का संचार है तू।।

सुन माली के मधुर वचन, उसने बंद नयन खोले।

जग उठी चेतना तन-मन की, अधरों से दिव्य वचन बोले।।

अपनी पावन गंध सहेजूंगी, खुद को न मैं खोने दूंगी।

अपने सोए अरमानों को, कभी नहीं सोने दूंगी।।

कभी नहीं सोने दूंगी, मैं कभी नहीं सोने दूंगी...........

कभी नहीं सोने दूंगी, मैं कभी नहीं सोने दूंगी.........

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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धन्यवाद। 

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