अमर गीत

अमर गीत

सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा


Sung by Bindu Jain

 धुन: मैली चादर ओढ़ के कैसे, द्वार तुम्हारे आऊँ.......

 मेरा गीत अमर हो जाए, ऐसा गीत लिखूं मैं कैसे?

मेरी प्रीत अमर हो जाए,ऐसी प्रीत करूं मैं कैसे?


मन में भाव तरंगें उठ-उठ, अनजाने पथ पर बह जाती

कंटक पत्थर से टकरा, अन- कही वेदना को सह जाती

भाव लेखनी के बंधन में, बतला दो बांधू मैं कैसे?

मेरा गीत अमर हो जाए, ऐसा गीत  लिखूं मैं कैसे?


बर्फीली वादी से निकल कर, सरिता कलकल बहती जाती

बहती लहरों की गुंजन से, सबको मधुर  संगीत सुनाती

तन मन को अमृत  से भर दे, ऐसा पान कराऊं मैं कैसे? 

मेरा गीत अमर हो जाए, ऐसा गीत लिखूं मैं कैसे?


प्यार  के  मीठे बोल बोल दो, सबका मन हर्षित  हो जाए 

हर मानव को गले लगा लो, मानवता गर्वित  हो जाए 

सबके मन को जोड़ सके जो, ऐसी तान सुनाऊं मैं कैसे? 

मेरा गीत अमर हो जाए, ऐसा गीत लिखूं मैं कैसे?


उम्र  है छोटी, काम बड़ा है, जो करना है, तत्पर कर लो

नफरत  के कांटे न उगाओ, प्रेम  पुष्प से झोली भर  लो

क्षमाभाव के सुरभित पुष्पों, का उद्यान  लगाऊं मैं कैसे?

जन-जन के मन में बस जाए , शीत बयार बहाऊँ मैं कैसे?

मेरा गीत अमर हो जाए, ऐसा गीत लिखूं मैं कैसे?

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

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धन्यवाद। 

Comments

  1. अति उतम उद्गार और अभिव्यक्ति चढ़दियां कलां

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