चिर-वियोग के पल

 चिर-वियोग के पल

सरिता जैन, सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका, हिसार की लेखनी द्वारा


Sung by Bindu Jain, Delhi

कोई ऐसे भी कहीं, जाता है सबसे रूठ कर; 

और जाता भी है तो, फिर लौट क्यों आता नहीं।

 (1) 

क्या हुई गुस्ताखियाँ, जो आपने मोड़ा है मुख, 

ऐसा साथी इस जहां में, हर कोई पाता नहीं।

 (2) 

आपने अंगुली पकड़, चलना हमें सिखला दिया; 

अब तो अपने पाँव पर भी, है चला जाता नहीं।

 (3) 

आशियाँ हमको मिला है, ये बदौलत आपकी; 

आज इस आँगन में तेरा अक्स भी पाता नहीं।

 (4) 

छिप कर खड़े हो क्यों यहां, सबको रुलाने के लिए; 

महसूस होता है मगर, क्यों सामने आता नहीं।

 (5) 

है यही अरदास भगवन्, हमको कुछ तो शक्ति दो; 

वरना इक पल याद को, तेरी भुला पाता नही।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

यदि आपको यह लेख प्रेरणादायक और प्रसन्नता देने वाला लगा हो तो कृपया comment के द्वारा अपने विचारों से अवगत करवाएं और दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सकें इसलिए अधिक-से-अधिक share करें।

धन्यवाद। 

Comments

Popular posts from this blog

दुनिया एक नाटक है

Don't get upset

माँ की ममता

प्यारी बिटिया

Don't make catastrophe

मुरझाया चमन

अमर गीत

Y for Yourself

जीवन संगिनी की मधुर स्मृति में स्मरणांजलि

Be grateful to God.