Avoid stress of perfection
पूर्ण प्रवीणता और आदर्शवादिता के तनाव से बचो।.Avoid stress of perfection and
idealism.
इस दुनिया में बहुत से लोग हैं जो हमेशा तनाव में रहते हैं क्योंकि वे प्रत्येक काम में पूर्ण दक्षता की उम्मीद रखते हैं परन्तु वे इसे पाने में समर्थ नहीं होते। इस संबंध में कृपया यह समझें कि पूर्ण दक्षता का गुण तो केवल ‘भगवान’ के पास है। परिभाषा के अनुसार- हम मनुष्य शत-प्रतिशत प्रवीण नहीं हो सकते। सवाल यह नहीं है कि हम किस स्तर तक पहुँचे हैं, लेकिन यह सच है कि हम ग़लतियां करना नहीं छोड़ पाते।हम अपने सतत ज्ञान व अभ्यास से अपनी अप्रवीणता को कम तो कर सकते हैं, लेकिन हम निष्कलंक प्रवीणता को प्राप्त नहीं कर सकते। एक मनुष्य केवल तभी पूर्ण दक्षता प्राप्त कर सकता है, जब वह चेतना के उच्चतम स्तर तक पहुँच जाए, जिसे ‘मोक्ष’ या ‘निर्वाण’ या ‘मुक्ति’ या ‘भगवद् सत्ता की अनुभूति’ की अवस्था कहते हैं। इस अवस्था में वह एक सामान्य व्यक्ति नहीं रहता और भगवान का सह-भागीदार बन जाता है। उसे फिर पाठ सीखने या प्रवीणता प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रह जाती और वह जन्म और मृत्यु के चक्कर से आज़ाद हो जाता है।
मिट्टी का घरौंदा आर्यन अपनी कक्षा का सबसे मेधावी छात्र था। उसके माता-पिता और शिक्षक हमेशा उससे "पूर्ण प्रवीणता" की उम्मीद रखते थे—हर परीक्षा में 100 में से 100 अंक, हर खेल में जीत और हर चित्रकारी में जीवंतता। आर्यन को लगने लगा था कि यदि वह थोड़ा भी कम रहा, तो वह "असफल" माना जाएगा। एक शाम, स्कूल के सालाना कला उत्सव के लिए वह अपना प्रोजेक्ट तैयार कर रहा था। वह एक मिट्टी का घर बना रहा था, लेकिन हर बार जब वह थोड़ा टेढ़ा होता, आर्यन उसे गुस्से में तोड़ देता। उसे डर था कि वह दुनिया का सबसे बेहतरीन घरौंदा नहीं बना पाएगा। तनाव के कारण उसके हाथ कांपने लगे और उसकी आँखों में आँसू आ गए। उसके दादाजी दूर से यह सब देख रहे थे। वे पास आए और बोले, "बेटा, प्रकृति को देखो। क्या कोई पेड़ बिल्कुल सीधा है? क्या हर फूल एक जैसा दिखता है? फिर भी यह दुनिया सुंदर है।" आर्यन ने सुबकते हुए कहा, "लेकिन दादाजी, अगर यह परफेक्ट नहीं हुआ तो सब क्या कहेंगे?" दादाजी मुस्कुराए और उन्होंने गीली मिट्टी से एक टेढ़ा-मेढ़ा छोटा सा घर बनाया। उन्होंने कहा, "पूर्ण प्रवीणता एक भ्रम है जो हमें आगे बढ़ने से रोकता है। असली सुंदरता सीखने की कोशिश और उस काम के आनंद में है। यह घरौंदा सुंदर इसलिए नहीं है कि यह सीधा है, बल्कि इसलिए है क्योंकि इसे तुमने अपने हाथों से प्यार से बनाया है।" आर्यन को अपनी गलती समझ आ गई। उसने तनाव छोड़ दिया और उस रात एक ऐसा घरौंदा बनाया जो शायद "परफेक्ट" तो नहीं था, लेकिन उसे बनाने में उसे जो खुशी मिली, वह सबसे बड़ी उपलब्धि थी। उस दिन उसने सीखा कि सफलता का मतलब केवल शीर्ष पर होना नहीं, बल्कि अपनी कमियों के साथ खुद को स्वीकार करना भी है।
कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो किसी समस्या का केवल एक सही हल पाने का आग्रह करते हैं। आवश्यकता यह है कि किसी समस्या का केवल एक पूर्णतया सही हल प्राप्त करने पर दबाव डालने के स्थान पर व्यक्ति को पर्याप्त मात्रा में अच्छे हल प्राप्त करने के प्रयत्न करने चाहिएं, ताकि हमारा व्यावहारिक उद्देश्य अच्छी प्रकार पूरा हो जाय। केवल पूर्ण दक्षता और प्रत्येक स्थिति में आदर्शवादिता की उम्मीद रखना लगातार तनाव की ओर ले जाता है। हमारा उद्देश्य इन गलतियों से कुछ सीखने का होना चाहिए और जहां तक संभव हो अपनी अकुशलता के स्तर को लगातार कम करना चाहिए। ग़लतियां करना मानव का प्राकृतिक स्वभाव है। इसमें कुछ भी असामान्य या आपराधिक नहीं है। ग़लतियां करने के बाद तुम्हें अपने आप को छिपाने अथवा शर्मिंदा होने की आवश्यकता नहीं है। महत्त्वपूर्ण बात है उन गलतियों से सबक लेना और अपने आप को पहली से दूसरी, दूसरी से तीसरी, तीसरी से चौथी और इसी प्रकार लगातार प्रत्येक सीढ़ी पर सुधारने की प्रक्रिया को आरम्भ करना। अपनी जीवन-यात्रा को किसी एक बिन्दु पर ठहरने मत दो। तुम्हें अपने जीवन को हर पल और हर क्षेत्र में सुधारना है। यदि हम अपनी ग़लतियों से ‘सीख’ नहीं लेते तो हम लाभ प्राप्त करने के उस सबक को खो देंगे जो प्रत्येक ग़लती अपने साथ लाती है।
इस दुनिया में बहुत से लोग हैं जो हमेशा तनाव में रहते हैं क्योंकि वे प्रत्येक काम में पूर्ण दक्षता की उम्मीद रखते हैं परन्तु वे इसे पाने में समर्थ नहीं होते। इस संबंध में कृपया यह समझें कि पूर्ण दक्षता का गुण तो केवल ‘भगवान’ के पास है। परिभाषा के अनुसार- हम मनुष्य शत-प्रतिशत प्रवीण नहीं हो सकते। सवाल यह नहीं है कि हम किस स्तर तक पहुँचे हैं, लेकिन यह सच है कि हम ग़लतियां करना नहीं छोड़ पाते।
हम अपने सतत ज्ञान व अभ्यास से अपनी अप्रवीणता को कम तो कर सकते हैं, लेकिन हम निष्कलंक प्रवीणता को प्राप्त नहीं कर सकते। एक मनुष्य केवल तभी पूर्ण दक्षता प्राप्त कर सकता है, जब वह चेतना के उच्चतम स्तर तक पहुँच जाए, जिसे ‘मोक्ष’ या ‘निर्वाण’ या ‘मुक्ति’ या ‘भगवद् सत्ता की अनुभूति’ की अवस्था कहते हैं। इस अवस्था में वह एक सामान्य व्यक्ति नहीं रहता और भगवान का सह-भागीदार बन जाता है। उसे फिर पाठ सीखने या प्रवीणता प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रह जाती और वह जन्म और मृत्यु के चक्कर से आज़ाद हो जाता है।
कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो किसी समस्या का केवल एक सही हल पाने का आग्रह करते हैं। आवश्यकता यह है कि किसी समस्या का केवल एक पूर्णतया सही हल प्राप्त करने पर दबाव डालने के स्थान पर व्यक्ति को पर्याप्त मात्रा में अच्छे हल प्राप्त करने के प्रयत्न करने चाहिएं, ताकि हमारा व्यावहारिक उद्देश्य अच्छी प्रकार पूरा हो जाय। केवल पूर्ण दक्षता और प्रत्येक स्थिति में आदर्शवादिता की उम्मीद रखना लगातार तनाव की ओर ले जाता है।
हमारा उद्देश्य इन गलतियों से कुछ सीखने का होना चाहिए और जहां तक संभव हो अपनी अकुशलता के स्तर को लगातार कम करना चाहिए। ग़लतियां करना मानव का प्राकृतिक स्वभाव है। इसमें कुछ भी असामान्य या आपराधिक नहीं है। ग़लतियां करने के बाद तुम्हें अपने आप को छिपाने अथवा शर्मिंदा होने की आवश्यकता नहीं है। महत्त्वपूर्ण बात है उन गलतियों से सबक लेना और अपने आप को पहली से दूसरी, दूसरी से तीसरी, तीसरी से चौथी और इसी प्रकार लगातार प्रत्येक सीढ़ी पर सुधारने की प्रक्रिया को आरम्भ करना। अपनी जीवन-यात्रा को किसी एक बिन्दु पर ठहरने मत दो। तुम्हें अपने जीवन को हर पल और हर क्षेत्र में सुधारना है। यदि हम अपनी ग़लतियों से ‘सीख’ नहीं लेते तो हम लाभ प्राप्त करने के उस सबक को खो देंगे जो प्रत्येक ग़लती अपने साथ लाती है।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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