Don’t lower your level
Don’t lower your level to the level of the person who is
misbehaving you.
इस जीवन में बहुत से पल ऐसे आते हैं, जब दूसरे लोग तुम्हारे साथ लड़ाई करने लगते हैं और दुर्व्यवहार करने लगते हैं। बिना किसी कारण तुम पर अवांछित टिप्पणियां करने लगते हैं, लेकिन यह सब या तो किसी
अनचाही क्रिया की प्रतिक्रिया है या उनकी नीच प्रकृति का लक्षण है। इस स्थिति में एक निर्दोष व्यक्ति की स्वाभाविक प्रतिक्रिया होगी यह सिद्ध करना कि यह पहले व्यक्ति की ग़लती है, जिसने बिना बात लड़ाई
शुरू की थी, लेकिन कई व्यक्ति ऐसी टिप्पणियां सुन कर और अधिक उग्र व आक्रमणकारी हो जाते हैं।
इस मामले में प्रतिक्रिया करने का सही व्यवहार क्या है? ऐसी स्थिति में तुम अवश्य ही यह महसूस करो कि यह व्यक्ति अपनी बुरी आदतों और प्रकृति (स्वभाव) के वश में होकर तुम्हारे साथ दुर्व्यवहार कर रहा है। उसके बुरे स्वभाव और मन की नीच अवस्था के कारण हमें अपने आप को अव्यवस्थित (upset) नहीं करना चाहिए। उसकी बुरी प्रकृति और स्वभाव के कारण उसे ही तनावयुक्त और अव्यवस्थित (upset) होने दो। उसकी मानसिक स्थिति के लिए तुम ज़िम्मेदार नहीं हो।
उसके साथ लड़ना शुरू करके तुम भी अपने स्तर को नीचा गिरा देते हो, जो वांछित नहीं है। तुम्हें अपना मानसिक स्तर और सिद्धांत कायम रखने चाहिएं। ऐसी घटनाओं में सही व सबसे अच्छा व्यवहार है, ऐसे व्यक्ति को अनदेखा करना। उसके बारे में अधिक सोच कर और अच्छे या बुरे, ठीक या ग़लत के बारे में उसके साथ बहस करके तुम अनावश्यक रूप से उसे अधिक महत्त्व दे रहे हो जिसका वह वास्तव में पात्र नहीं है।
यदि उस व्यक्ति में अपने तर्कों को सिद्ध करने की आवश्यक बुद्धि होती, तो वह पहले ही लड़ना शुरू नहीं करता। यह तो ऐसा ही है कि जैसे तुमने ठीक या ग़लत का तर्क एक मूर्ख व्यक्ति के सामने करना शुरू कर दिया हो। क्या इसका कोई लाभ होगा? नहीं, ऐसी परिस्थिति में सबसे अच्छा तरीका लड़ाई को अधिक लम्बा न खींचने के लिए उस स्थान से दूर हटना ही है। वास्तव में किसी व्यक्ति के साथ बहस या तर्क करने से पहले तुम्हें यह अवश्य सोचना चाहिए कि इस व्यक्ति के साथ इतनी शक्ति लगाना या समय नष्ट करना वास्तव में लाभदायक है या नहीं तथा उसकी क्रियाएं वास्तव में इतनी महत्त्वपूर्ण हैं या नहीं। अपनी बुद्धि के उच्चतर स्तर के द्वारा ऐसी स्थितियों की निरर्थकता को मान कर अपने मन को समझा लो।
सादगी का स्वर्ण पदक एक बार एक प्रसिद्ध संत अपने शिष्यों के साथ नगर में जा रहे थे। रास्ते में उन्हें एक व्यक्ति मिला जो बहुत ही कटु, अभद्र और अपमानजनक बातें बोल रहा था। वह व्यक्ति संत के धैर्य को परखने के लिए उनके बारे में अपशब्द कह रहा था। शिष्य बहुत क्रोधित हो गए और उस व्यक्ति को सबक सिखाने के लिए आगे बढ़े, लेकिन संत ने उन्हें हाथ के इशारे से रोक दिया। संत उस व्यक्ति के सामने से बहुत ही विनम्रता, शांति और गरिमा के साथ मुस्कुराते हुए निकल गए। जब वे थोडा आगे बढ़े, तो एक शिष्य ने पूछा, "गुरुदेव, आपने उस नीच व्यक्ति को उत्तर क्यों नहीं दिया? उसने आपका इतना अपमान किया।" संत मुस्कुराए और बोले, "प्रिय, वह व्यक्ति अपने व्यवहार से अपनी 'नीचता' का प्रदर्शन कर रहा था, और यदि मैं उसे उसी की भाषा में उत्तर देता, तो मैं भी अपना स्तर गिराकर उसके जैसा ही बन जाता। कोई आपके साथ कितना भी बुरा व्यवहार करे, कभी भी अपने स्तर से नीचे न गिरें, शांत रहो। यदि आप विनम्र रहते हैं, तो आप अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करते हैं, न कि उसकी नीचता"। सीख: यह कहानी हमें सिखाती है कि व्यक्ति का सबसे सुंदर श्रृंगार सादगी और विनम्रता है। विपरीत परिस्थितियों में भी अपना संयम न खोना ही चरित्र की असली परीक्षा है।
तुम यह बात भी स्पष्ट रूप से जानते हो कि किसी व्यक्ति द्वारा किए गए किसी भी ठीक या ग़लत व्यवहार के लिए, वह दैवीय न्याय के द्वारा स्वयमेव ही ख़ुशी या ग़म प्राप्त करेगा। इस खाते में किसी को बख़्शा नहीं जाता। इसलिए प्रत्येक को सबक सिखाने में अपने जीवन का कीमती समय बिताना आवश्यक नहीं है। तुम्हारी कोशिश तो सभी तरह के लोगों के बीच में से किसी तरह अपना मार्ग खोजने की होनी चाहिए ताकि तुम्हारे विकास और तुम्हारे कार्यों में बाधा न आए।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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