Eliminate self-centeredness

अपनी बातों और कामों के बारे में आत्म-केन्द्रितपना या आत्म-प्रशंसा का भाव छोड़ दो। 

Eliminate self-centeredness in your talking and dealings.

कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनकी सारी बातचीत मुझे, मेरा, मैं या मैंने यह किया, मुझे यह अच्छा लगता है और इसी प्रकार की बातों से भरी होती हैं। इसमें हम भी शामिल हैं। उनकी बातों से यह ज़ाहिर होता है कि उनसे अच्छा इस दुनिया में कोई भी नहीं है। वास्तव में केवल अपने बारे में बोलना या

सोचना संकुचित बुद्धि के निम्न स्तर का लक्षण है, जिसके द्वारा हम अपने आप को बहुत छोटा बना लेते हैं। हम अधिक समय तक भगवान की महान लीला के प्रतिभागी और इस विश्व का एक हिस्सा नहीं रहते, हम अलग हो जाते हैं और इसलिए बाहरी दुनिया से नाख़ुश और बेचैन महसूस करते हैं।

अपने आप को इस दुनिया का हिस्सा समझो और भगवान की विशाल लीला का एक अंग मानो, जो यहां फैली हुई है। तुम अन्य व्यक्तियों से अलग नहीं हो। हम सब की सामान्य आवष्यकताएं और लक्ष्य एक हैं।

हम सब का भगवान के साथ एक जैसा सम्बन्ध है। सारे विश्व को ध्यान में रखते हुए व सामान्य लाभ को ध्यान में रखते हुए कुछ सोचना और विभिन्न कार्यों को करना विस्तृत चेतना के लक्षण हैं और इससे इस धरती पर आने का उद्देश्य और लक्ष्य दोनों वास्तव में पूर्ण होते हैं। केवल व्यक्तिगत लाभ को दृष्टिगत रखते हुए प्रत्येक कार्य को करना बहुत ही स्वार्थीपन है और एक मनुष्य होने के नाते अनुचित है। यह इस दुनिया में हमारे अस्तित्व के उच्च लक्ष्य को नकारता है। 

अहंकार का घड़ा

एक गाँव में सोमदत्त नाम का एक मूर्तिकार रहता था। वह बहुत सुंदर मूर्तियां बनाता था, लेकिन उसे अपनी कला पर बहुत घमंड था। वह हमेशा कहता, "मेरे जैसा कलाकार पूरे राज्य में नहीं है। मेरी मूर्तियों में तो साक्षात प्राण बसते हैं।"

एक बार उसने एक बहुत ही भव्य मूर्ति बनाई। जब वह मूर्ति पूर्ण हो गई, तो वह गाँव के चौराहे पर जाकर खड़ा हो गया और लोगों से अपनी प्रशंसा करने के लिए कहने लगा। लोग उसकी कला की सराहना करते, लेकिन सोमदत्त को लगता कि वे पर्याप्त प्रशंसा नहीं कर रहे हैं।

उसी समय, एक वृद्ध साधु वहाँ से गुजरे। सोमदत्त ने उन्हें भी अपनी मूर्ति दिखाई और अपनी बड़ाई करने लगा। साधु ने मूर्ति को ध्यान से देखा और मुस्कुराकर बोले, "मूर्तिकार तो बहुत निपुण है, लेकिन..."

सोमदत्त ने पूछा, "लेकिन क्या, महाराज?"

साधु ने कहा, "लेकिन इस मूर्ति की आंखों में जो सौम्यता और विनम्रता होनी चाहिए, वह नहीं है और इसका कारण यह है कि बनाने वाले के मन में अहंकार भरा हुआ है।"

सोमदत्त को गुस्सा आया, लेकिन वह साधु की बात पर चुप रहा। अगले दिन, उसने और अधिक मेहनत की और पहले से भी अच्छी मूर्ति बनाई। फिर वह साधु के पास गया। साधु ने फिर कहा, "कला अद्भुत है, पर अहंकार का भाव अभी भी बाकी है।"

सोमदत्त को साधु पर क्रोध आया, लेकिन उसने सोचा कि जब तक मैं अपनी आत्म-प्रशंसा का भाव नहीं छोड़ूँगा, तब तक मेरी कला अधूरी ही रहेगी। उसने उस दिन से दूसरों से प्रशंसा सुनना बंद कर दिया और अपनी कला को बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित किया। वह अपने मन से "मैं" की भावना को दूर करने लगा।

कुछ दिनों बाद, जब उसने एक और मूर्ति बनाई, तो साधु ने उसे देखा और मुस्कुराते हुए कहा, "अब इस मूर्ति में न केवल कला है, बल्कि इसमें कलाकार का समर्पण भी है। अब तुम एक सच्चे कलाकार बन गए हो।"

सोमदत्त को समझ आ गया कि सच्चा सम्मान आत्म-प्रशंसा से नहीं, बल्कि कर्म और विनम्रता से मिलता है।

सीख: अपनी प्रशंसा खुद करने से व्यक्ति का विकास रुक जाता है। विनम्रता ही सच्चा आभूषण है और आत्म-प्रशंसा का भाव छोड़कर ही व्यक्ति महान बनता है 

जब भी तुम अपनी शेख़ी बघारने के लिए लालायित होते हो या केवल अपने स्वार्थ या समस्याओं के बारे में बात करते हो तो अपने आप को रोकने के लिए अपनी इच्छा-शक्ति का प्रयोग करो। अपनी उपलब्धियों के बारे में बताना अच्छा है लेकिन झूठी शेख़ी बघारना दंभ का परिचायक है।

वास्तव में जब चेतना विकसित होती है तो केवल अपने लिए काम करने और जीवन जीने का विचार मूर्खतापूर्ण दिखाई देता है।

द्वारा--सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏

विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।  

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