नदिया की धार
नदिया की धार
Sung by - Bindu Jain, Delhi
नदिया की जल धारा बहती, मानो अश्रु धारा।
मन का भेद न कोई समझा, हार गया जग सारा।
घर से निकली, शांत सरल- चित्त, अब क्यों रुदन मचाती।
पथरीली राहों पर चलती, आगे बढती जाती।
क्या पता नहीं था, तन और मन, छलनी-छलनी हो जाएगा।
आंखों से अश्रु-धार बहेगी, कोई न साथ निभाएगा।
पर्वत ने भी समझाया था बिल्कुल मत घबराना।
कंकर-पत्थर भी बनें न बाधक, आगे बढ़ती जाना।
अपना रास्ता स्वयं बनाना, मंजिल को पा जाओगी।
पीछे मुड़ कर कभी न देखो, जग में नाम कमाओगी।
थाह कोई भी पा न सका, न नदिया की, न नयनों की।
धार निरंतर बहती रहती, परवाह नहीं बाधाओं की।
ऊंची, नीची राह मिले, या हो भूमि समतल मैदान।
रुदन करे या शांत रहे पर, चलती अविरल और अविराम।
गर मंजिल को पाना है तो कष्टों से मत घबराना,
चलते रहना, बढते रहना, मन को कभी न भटकाना।
द्वारा--सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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