नाम स्मरण का महत्त्व

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नाम स्मरण का महत्त्व


कहा जाता है कि 

‘दुःख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय’

‘जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय।’ 

दुःख में तो भगवान का नाम स्वतः ही ज़ुबान पर आ जाता है - ‘हे भगवान! मुझे इस दुःख से बाहर निकलने का रास्ता दिखाओ। अब तो तुम्हारा ही सहारा है।’ पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने खाते में पुण्य का बैलैंस न होते हुए भी पाप से तुरन्त मुक्ति पाना चाहते हैं। ऐसे में तो भगवान भी उनकी मदद नहीं कर सकता। वे सोचते हैं कि इतना पूजा-पाठ करने के बाद भी दुःखों से पीछा नहीं छूट रहा तो भगवान का नाम लेने से क्या लाभ?

जैसे कभी हम बिना मन के जल्दी-जल्दी खाना खा लेते हैं तो पेट भी भरता है और कुछ-न- कुछ ताकत भी साथ में मिलती है, उसी प्रकार दुःख के समय मन न होते हुए भी नाम-स्मरण करने से सुख मिले या न मिले, दुःख का समय तो कटता ही है। अतः बिना प्रतिफल की चिन्ता किए सतत नाम-स्मरण करते रहना चाहिए। समय आने पर उसका फल अवश्य मिलेगा। 

एक व्यक्ति ने देखा कि कोई आदमी एक सुन्दर कद-काठी वाले घोड़े पर सवार हो कर चला जा रहा था। उसके मन में आया कि मैं किसी प्रकार इस घोड़े को हासिल कर लूं। वह उस आदमी से घोड़ा प्राप्त करने का उपाय पूछने लगा। उस आदमी ने कहा कि यदि तुम 3 किलोमीटर तक मेरे साथ इस घोड़े पर बैठ कर राम-नाम जपते हुए चलो और बीच में कोई बातचीत न करो तो तुम्हारे पास इतना पुण्य इकट्ठा हो जाएगा कि तुम इस घोड़े को प्राप्त करने के अधिकारी बन जाओगे।

उस व्यक्ति ने सोचा कि यह तो बहुत आसान काम है। उसने ‘हां’ कह दी। वे दोनों घोड़े पर सवार हो कर चल पड़े। वह 2 किलोमीटर तक राम-नाम जपते हुए चलता रहा, पर उस के बाद भी उसके मन में यही दुविधा बनी रही कि यह घोड़ा तो दे देगा न! चलो! घोड़ा तो दे ही देगा पर मैंने लगाम देने की बात तो की ही नहीं। पता नहीं, यह मुझे लगाम भी देगा या नहीं। उसका मन राम-नाम से हट कर लगाम-नाम में लग गया।

जैसे-जैसे मंज़िल नज़दीक आने लगी उसका मन विचलित होने लगा। जब बेचैनी सहनशक्ति से बाहर हो गई तो उससे नहीं रहा गया और उसने पूछ ही लिया कि मैं राम-नाम तो ले रहा हूँ पर तुम मुझे लगाम भी दोगे या नहीं। 

उस आदमी ने कहा कि तुमने तो न बोलने का नियम ही भंग कर दिया। अब तो तुम घोड़े को प्राप्त करने के भी अधिकारी नहीं रहे, लगाम की तो बात ही न करो। 

इसलिए यदि हम नाम-स्मरण का पूरा लाभ उठाना चाहते हैं तो उससे मिलने वाले लाभ की चिन्ता किये बिना केवल भगवान के नाम को व उनके गुणों को ही स्मरण करना चाहिए। वरना ध्यान रहे, लगाम की चिन्ता में लगाम भी नहीं मिलेगी और उसके साथ-साथ घोड़ा भी हाथ से निकल जायेगा।

प्रभु के नाम-स्मरण में सब दुःखों को दूर करने की अपार शक्ति होती है।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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