शुभ दिन

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शुभ दिन

Image by Jörg Möller from Pixabay

“बेटा! थोड़ा खाना खाकर जाना। दो दिन से तूने कुछ खाया नहीं है।” ये लाचार माता के शब्द थे अपने बेटे को समझाने के लिए।

“देखो मम्मी! मैंने मेरी बारहवीं बोर्ड की परीक्षा के बाद वेकेशन में सेकेंड हैंड बाइक मांगी थी और पापा ने प्रोमिस किया था। आज मेरे आखिरी पेपर के बाद दीदी को कह देना कि जैसे ही मैं परीक्षा खंड से बाहर आऊं, तब पैसा लेकर बाहर खड़ी रहे। मेरे दोस्त की पुरानी बाइक आज ही मुझे लेनी है। और हाँ! यदि दीदी वहाँ पैसे लेकर नहीं आई तो मैं घर वापस नहीं आऊंगा।”

एक ग़रीब घर में बेटे मोहन की जिद्द और माता की लाचारी आमने-सामने टकरा रही थी।

“बेटा! तेरे पापा तुझे बाइक लेकर देने ही वाले थे, लेकिन पिछले महीने हुए एक्सिडेंट......।

मम्मी कुछ बोले उसके पहले मोहन बोला, “मैं कुछ नहीं जानता। मुझे तो बाइक चाहिए ही चाहिए।”

ऐसा बोलकर मोहन अपनी मम्मी को ग़रीबी एवं लाचारी की मंझधार में छोड़ कर घर से बाहर निकल गया।

12वीं बोर्ड की परीक्षा के बाद भागवत ‘सर’ एक अनोखी परीक्षा का आयोजन करते थे।

हालांकि भागवत सर का विषय गणित था। किन्तु विद्यार्थियों को जीवन का गणित भी समझाते थे और उनके सभी विद्यार्थी विविधता से भरी यह परीक्षा अवश्य देने जाते थे।

इस साल परीक्षा का विषय था - ‘मेरी पारिवारिक भूमिका’।

मोहन परीक्षा खंड में आकर बैठ गया।

उसने मन में गांठ बांध ली थी कि यदि मुझे बाइक लेकर नहीं देंगे तो मैं घर नहीं जाऊंगा।

भागवत सर की क्लास में सभी को पेपर वितरित हो गया। पेपर में 10 प्रश्न थे। उत्तर देने के लिये एक घंटे का समय दिया गया था।

मोहन ने पहला प्रश्न पढ़ा और जवाब लिखने की शुरुआत की।

प्रश्न नंबर 1 - आपके घर में आपके पिताजी, माताजी, बहन, भाई और आप कितने घंटे काम करते हो? सविस्तार बताइए।

मोहन ने जल्दी-जल्दी जवाब लिखना शुरू कर दिया।

जवाब -

पापा सुबह छह बजे टिफिन के साथ अपनी ओटोरिक्शा लेकर निकल जाते हैं और रात को नौ बजे वापस आते हैं। कभी-कभार जल्दी भी जाना पड़ता है। ऐसे वे लगभग पंद्रह घंटे काम करते हैं।

मम्मी सुबह चार बजे उठकर पापा का टिफिन तैयार करती हैं। बाद में घर का सारा काम करती हैं। दोपहर को सिलाई का काम करती है और सभी के सो जाने के बाद वे सोती हैं। लगभग रोज़ के सोलह घंटे।

दीदी सुबह कॉलेज जाती हैं। शाम को 4 से 8 पार्ट टाइम जॉब करती हैं और रात्रि को मम्मी को काम में मदद करती हैं। लगभग बारह से तेरह घंटे।

मैं सुबह छह बजे उठता हूँ और दोपहर को स्कूल से आकर खाना खाकर सो जाता हूँ। शाम को अपने दोस्तों के साथ टहलने जाता हूँ। रात्रि को ग्यारह बजे तक पढ़ता हूँ। लगभग दस घंटे।

इस प्रकार मोहन को मन ही मन लगा कि उसका कामकाज में औसत सबसे कम है।

पहले सवाल के जवाब के बाद मोहन ने दूसरा प्रश्न पढ़ा।

प्रश्न नंबर 2 - आपके घर की मासिक कुल आमदनी कितनी है?

जवाब -

पापा की आमदनी लगभग दस हज़ार है। मम्मी एवं दीदी मिलकर पांच हजार जोड़ते हैं। कुल आमदनी पंद्रह हज़ार।

प्रश्न नंबर 3 - मोबाइल रिचार्ज प्लान, आपकी मनपसंद टीवी पर आ रहे तीन सीरियल के नाम, शहर के एक सिनेमा हॉल का पता और अभी वहां चल रही मूवी का नाम बताइए।

सभी प्रश्नों के जवाब आसान होने के कारण मोहन ने फटाफट दो मिनट में लिख दिए।

प्रश्न नंबर 4 - एक किलो आलू और भिन्डी के अभी हाल की कीमत क्या है? एक किलो गेहूं, चावल और तेल की कीमत बताइए? और जहाँ पर घर का गेहूं पिसाने जाते हो उस आटा चक्की का पता दीजिये।

मोहन को इस सवाल का जवाब नहीं आया। उसे समझ में आया कि हमारी दैनिक आवश्यक ज़रूरतों की चीजों के बारे में तो उसे लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है। मम्मी जब भी कोई काम बताती थी तो मना कर देता था। आज उसे ज्ञान हुआ कि अनावश्यक चीजें मोबाइल रिचार्ज, मूवी का ज्ञान इतना उपयोगी नहीं है। अपने घर के काम की जवाबदेही लेने से या तो हाथ बटां कर साथ देने से हम कतराते रहते हैं।

प्रश्न नंबर 5 - आप अपने घर में भोजन को लेकर कभी तकरार या गुस्सा करते हो?

जवाब -

हां। मुझे आलू के सिवा कोई भी सब्जी पसंद नहीं है। यदि मम्मी और कोई सब्जी बनाए तो मेरे घर में झगड़ा होता है। कभी-कभी मैं बगैर खाना खाए उठ खड़ा हो जाता हूँ।

इतना लिखते ही मोहन को याद आया कि आलू की सब्जी से मम्मी को गैस की तकलीफ होती है। पेट में दर्द होता है। वे अपनी सब्जी में एक बड़ी चम्मच अजवाइन डालकर खाती हैं। एक दिन मैंने ग़लती से मम्मी की सब्जी खा ली और फिर मैंने थूक दिया था। फिर पूछा कि मम्मी तुम ऐसे क्यों खाती हो? तब दीदी ने बताया था कि हमारे घर की स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि हम दो सब्जी बनाकर खाएं। तुम्हारी ज़िद के कारण मम्मी बेचारी क्या करें?

मोहन ने अपनी यादों से बाहर आकर अगले प्रश्न को पढ़ा।

प्रश्न नंबर 6 - आपकी अपने घर में की हुई आखि़री ज़िद के बारे में लिखिए।

मोहन ने जवाब लिखना शुरू किया। मेरी बोर्ड की परीक्षा पूर्ण होने के बाद दूसरे ही दिन बाइक के लिये जिद्द की थी। पापा ने कोई जवाब नहीं दिया था। मम्मी ने समझाया कि घर में पैसे नहीं हैं। लेकिन मैं नहीं माना। मैंने दो दिन से घर में ख़ाना खाना भी छोड़ दिया है। जब तक बाइक नहीं लेकर दोगे, मैं खाना नहीं खाऊंगा और आज तो मैं वापस घर नहीं जाऊंगा, कहकर निकला हूँ।

अपनी जिद का प्रामाणिकता से मोहन ने जवाब लिखा।

प्रश्न नंबर 7 - आपको अपने घर से मिल रही पॉकेट मनी का आप क्या करते हो? आपके भाई-बहन कैसे खर्च करते हैं?

जवाब -

हर महीने पापा मुझे सौ रुपये देते हैं। उसमें से मैं मनपसंद पर्फ्यूम, गोगल्स लेता हूं या अपने दोस्तों की छोटी-मोटी पार्टियों में खर्च करता हूँ।

मेरी दीदी को भी पापा सौ रुपये देते हैं। वह खुद कमाती हैं और पगार के पैसे से मम्मी को आर्थिक मदद करती हैं। हां! उसको दिए गए पॉकेटमनी को वह गल्ले में डालकर बचत करती हैं। उसे कोई मौज-शौक नहीं है, क्योंकि वह कंजूस भी है।

प्रश्न नंबर 8 - क्या आप अपनी खुद की पारिवारिक भूमिका व ज़िम्मेदारी को समझते हो?

प्रश्न अटपटा और जटिल होने के बाद भी मोहन ने जवाब लिखा।

परिवार के साथ जुड़े रहना। एक दूसरे के प्रति समझदारी से व्यवहार करना चाहिए एवं मदद रूप होना चाहिए और ऐसे अपनी जवाबदेही निभानी चाहिए।

यह लिखते-लिखते ही अंतरात्मा से आवाज आई कि अरे मोहन! क्या तुम खुद अपनी पारिवारिक भूमिका को योग्य रूप से निभा रहे हो? और अंतरात्मा से जवाब आया कि नहीं! बिल्कुल नहीं!!

प्रश्न नंबर 9 - क्या आपके परीक्षा-परिणाम से आपके माता-पिता खुश हैं? क्या वे अच्छे परिणाम के लिये आपसे जिद करते हैं, आपको डांटते रहते हैं?

इस प्रश्न का जवाब लिखने से पहले मोहन की आंखें भर आईं। अब वह परिवार के प्रति अपनी भूमिका बराबर समझ चुका था।

उसने लिखने की शुरुआत की।

वैसे तो मैं कभी भी मेरे माता-पिता को आजतक संतोषजनक परिणाम नहीं दे पाया हूँ। लेकिन इसके लिये उन्होंने कभी भी जिद नहीं की है। मैंने बहुत बार अच्छे रिजल्ट के प्रॉमिस तोड़े हैं। फिर भी हल्की सी डांट के बाद वही प्रेम और वात्सल्य बना रहता था।

प्रश्न नंबर 10 - पारिवारिक जीवन में असरकारक भूमिका निभाने के लिए इस वेकेशन में आप कैसे परिवार की मदद करेंगे?

जवाब में मोहन की कलम चले, इससे पहले उसकी आंखों से आंसू बहने लगे और जवाब लिखने से पहले ही कलम रुक गई। वह बैंच के नीचे मुंह रखकर रोने लगा। फिर से कलम उठाई, तब भी वह कुछ नहीं लिख पाया। अनुत्तर दसवां प्रश्न छोड़कर पेपर सबमिट कर दिया।

स्कूल के दरवाजे पर दीदी को देखकर उसकी ओर दौड़ पडा।

“भैया! ये ले आठ हजार रुपये। मम्मी ने कहा है कि बाइक लेकर ही घर आना।”

दीदी ने मोहन के सामने पैसे धर दिये।

“कहाँ से लाई ये पैसे?” मोहन ने पूछा।

दीदी ने बताया - “मैंने मेरे ऑफिस से एक महीने की सैलेरी एडवांस मांग ली। मम्मी भी जहां काम करती हैं, वहीं से उधार ले लिया और मेरी पॉकेटमनी की बचत से निकाल लिए। ऐसा करके तुम्हारी बाइक के पैसे की व्यवस्था हो गई है।

मोहन की दृष्टि पैसे पर स्थिर हो गई।

दीदी फिर बोली “भाई। तुम मम्मी को बोलकर निकले थे कि पैसे नहीं दोगी तो मैं घर पर नहीं आऊंगा! अब तुम्हें समझना चाहिए कि तुम्हारी भी घर के प्रति जिम्मेदारी है। मुझे भी बहुत से शौक हैं। लेकिन अपने शौक के स्थान पर अपने परिवार को मैं सबसे ज्यादा महत्व देती हूँ। तुम हमारे परिवार के सबसे लाडले हो। पापा को पैर की तकलीफ है फिर भी तेरी बाइक के लिये पैसे कमाने और तुम्हें दिये प्रॉमिस को पूरा करने अपने फ्रैक्चर वाले पैर होने के बावजूद काम किए जा रहे हैं, तेरी बाइक के लिये। यदि तुम समझ सको तो अच्छा है। कल रात को अपने प्रॉमिस को पूरा नहीं कर सकने के कारण बहुत दुःखी थे और इसके पीछे उनकी मजबूरी थी।

बाकी तुमने तो अनेकों बार अपने प्रॉमिस तोड़े ही हैं न!

मेरे हाथ में पैसे थमाकर दीदी घर की ओर चल निकली।

उसी समय उसका दोस्त वहां अपनी बाइक लेकर आ गया। अच्छे से चमका कर लाया था।

“ले मोहन! आज से ये बाइक तुम्हारी। सब बारह हज़ार में मांग रहे हैं। मगर ये तुम्हारे लिये आठ हज़ार में दे रहा हूँ।”

मोहन बाइक की ओर टुकुर-टुकुर देख रहा था और थोड़ी देर के बाद बोला - “दोस्त! तुम अपनी बाइक उस बारह हज़ार वाले को ही दे देना! मेरे पास पैसे की व्यवस्था नहीं हो पाई है और होने की संभावना भी नहीं है।”

और यह कह कर वह सीधा भागवत सर की केबिन में जा पहुँचा।

“अरे मोहन! कैसा लिखा है पेपर में? भागवत सर ने मोहन की ओर देख कर पूछा।

“सर! यह कोई पेपर नहीं था। यह तो मेरे जीवन के लिये दिशानिर्देश था। मैंने एक प्रश्न का जवाब छोड़ दिया है। किन्तु इसका जवाब लिखकर नहीं, अपने जीवन की जवाबदेही निभाकर दूंगा” और भागवत सर का चरणस्पर्श कर अपने घर की ओर निकल पड़ा।

घर पहुंचते ही मम्मी, पापा, दीदी सब उसकी राह देखते हुए खड़े थे।

“बेटा! बाइक कहाँ है?” मम्मी ने पूछा। मोहन ने दीदी के हाथों में पैसे थमा दिए और कहा कि सोरी! मुझे बाइक नहीं चाहिए और पापा! मुझे ऑटो की चाबी दो। आज से मैं पूरे वेकेशन तक ऑटो चलाऊँगा और आप थोड़े दिन आराम करेंगे और मम्मी! आज से मेरी पहली कमाई शुरू होगी। इसलिए तुम अपनी पसंद की मेथी की भाजी और बैंगन ले आना। रात को हम सब साथ मिलकर खाना खाएंगे।

मोहन के स्वभाव में आए परिवर्तन को देखकर मम्मी ने उसको गले लगा लिया और कहा कि “बेटा! सुबह जो कहकर तुम गए थे, वह बात मैंने तुम्हारे पापा को बताई थी। इसलिये वे दुःखी हो गए। काम छोड़ कर वापस घर आ गए। भले ही मुझे पेट में दर्द होता हो लेकिन आज तो मैं तेरी पसंद की ही सब्जी बनाऊंगी।”

मोहन ने कहा - “नहीं मम्मी! अब मैं समझ गया हूँ कि मेरे घर-परिवार में मेरी भूमिका क्या है? मैं रात को बैंगन मेथी की सब्जी ही खाऊंगा। परीक्षा में मैंने आख़िरी जवाब नहीं लिखा है। वह प्रैक्टिकल करके ही दिखाना है। और हाँ मम्मी! हम गेहूं को पिसवाने कहाँ जाते हैं? उस आटा चक्की का नाम और पता भी मुझे दे दो”।

उसी समय भागवत सर ने घर में प्रवेश किया और बोले, “वाह मोहन! जो जवाब तुमने लिखकर नहीं दिए, वे प्रैक्टिकल जीवन जी कर दे दिए।”

“सर! आप और यहाँ?” मोहन भागवत सर को देख कर आश्चर्यचकित हो गया।

“मुझे मिलकर तुम चले गये। उसके बाद मैंने तुम्हारा पेपर पढ़ा। इसलिए तुम्हारे घर की ओर निकल पड़ा। मैं बहुत देर से तुम्हारे अंदर आए परिवर्तन को सुन रहा था। मेरी अनोखी परीक्षा सफल रही और इस परीक्षा में तुमने पहला नंबर पाया है।”

ऐसा बोलकर भागवत सर ने मोहन के सर पर हाथ रखा।

मोहन ने तुरंत ही भागवत सर के पैर छुए और ऑटो रिक्शा चलाने के लिए निकल पड़ा।

मेरा सभी सम्माननीय अभिभावकों से आग्रह है कि आप इस पोस्ट को ज़रूर पढ़िएगा और अपने बच्चों को भी पढ़ने का अवसर दें। इससे अच्छी पोस्ट मैंने अपनी ज़िंदगी में आज तक नहीं पढ़ी। प्रैक्टिकल जीवन में तो मैंने अनुभव किया है लेकिन सभी लोगों को किस प्रकार से अनुभव कराया जाए, इसके लिए मेरा आपसे आग्रह है कि आप स्वयं और अपने बच्चों को इस पोस्ट को जरूर पढ़ने का अवसर प्रदान करें।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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विनम्र निवेदन

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धन्यवाद।

Comments

  1. बहुत ही प्रेरणात्मक।

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  2. बहुत ही प्रेरणात्मक। अनिल जैन

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