माता-पिता का अपने बच्चों पर अंकुशः क्यों, कब तक और कितना?

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माता-पिता का अपने बच्चों पर अंकुश

क्यों, कब तक और कितना?

Image by Miroslav Kaclík from Pixabay

यह समस्या प्रायः हमारे समाज के सभी वर्गों के माता-पिता के सामने आती है कि हमें अपने बच्चों से उचित मान-सम्मान नहीं मिल रहा, जबकि हमने उन्हें हर कार्य के लिए पूर्ण स्वतंत्रता दी हुई है। हर माता-पिता अपने व अपने बच्चों के भविष्य के प्रति पूर्णतया सतर्क रहते हैं, फिर चाहे वे सम्भ्रांत परिवार से संबंध रखते हों या मध्यम अथवा ग़रीब परिवार के हों।

यदि माता-पिता दोनों कामकाजी हैं, तो यह समस्या और भी बड़ी दिखाई देती है। वे समय के अभाव की पूर्ति केवल धन से करना चाहते हैं, पर चाह कर भी अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते। माता-पिता प्रचुर धन देने के बाद तो और भी सशंकित हो जाते हैं कि यह पैसा कहीं उनके बच्चों को ग़लत रास्ते पर न धकेल दे। वे बच्चों को अनावश्यक रूप से घर से बाहर घूमने पर अंकुश लगाते हैं। ऐसे माहौल में बच्चे अपने घर को एक पाँच सितारा कैदखाने की संज्ञा देने में भी संकोच नहीं करते और बड़े होकर विद्रोही व अपने मन के मालिक बन जाते हैं।

यदि माता-पिता के पास धन की नहीं, समय की अधिकता है तो वे भी 24 घंटे बच्चों को अपनी नज़रों के सामने देखना चाहते हैं। बचपन में की गई माता-पिता की तानाशाही, बच्चों के मन में भी हिटलरशाही को जन्म देती है और वे समाज में आसानी से घुल-मिल नहीं पाते और उद्दण्ड बन जाते हैं।

अतः यदि हम माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चों का भविष्य उज्ज्वल बने और उनका बुढ़ापा शांति से व्यतीत हो तो हमें अभी से इन प्रश्नों के उत्तर मालूम होने चाहिएं कि माता-पिता का अपने बच्चों पर अंकुश क्यों, कब तक और कितना होना चाहिए?

हमें एक पौधे के माध्यम से इन प्रश्नों के उत्तर मालूम हो सकते हैं।

जब एक माली अपनी मुट्ठी में बीज लेकर एक गमले में या क्यारी में बोने के लिए आगे बढ़ता है, तभी से उसके मन में उन बीजों की सुरक्षा का भाव भी जन्म लेने लगता है। वह माली उनकी सुरक्षा व स्वस्थ विकास के लिए अतिरिक्त सावधानी रखना आरम्भ कर देता है।

उचित गहराई में बीज डालकर, उसे मिट्टी से ढक देता है। समय-समय पर खाद डालता है, पानी से सींचता है और प्यार से उसके अंकुरित होने की प्रतीक्षा करता है।

आज के विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है कि यदि अंकुरित होने वाले बीज को या अंकुरित होते हुए नन्हें पौधे को संगीत सुनाया जाए और उसके साथ प्यार के बोल बोले जाएं तो उसकी वृद्धि शीघ्र होती है और वह एक स्वस्थ वृक्ष के रूप में विकसित होता है। हमारे शास्त्रों में इसे गर्भ-संस्कार कहा जाता था। यही दृष्टिकोण हमें अपनी होने वाली संतान के प्रति रखना चाहिए। अभिमन्यु की गर्भ के समय में प्राप्त की गई चक्रव्यूह तोड़ने की कला सीख लेना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। गर्भ में बच्चा अपने आसपास के वातावरण और व्यवहार से अपने जीवन में अच्छे गुणों का विकास कर सकता है। माता-पिता बनने की जिम्मेदारी उन्हें इसी समय से समझ में आ जानी चाहिए।

जब बीज में से पौधा अंकुरित होने लगता है तो माली उसके चारों ओर अतिरिक्त सुरक्षा के लिए एक ट्री गार्ड लगा देता है ताकि कोई पशु आदि उसे हानि न पहुँचा सके। आपने ध्यान से देखा होगा तो आप पाएंगे कि ट्री गार्ड पौधे से सटा कर नहीं अपितु एक निश्चित दूरी पर लगाया जाता है ताकि पौधे को विकसित होने के लिए वांछित धूप, हवा आदि पर्याप्त मात्रा में मिलती रहे। यदि वह कुछ दूरी नहीं बनाएगा तो पौधे की सुरक्षा तो हो जाएगी पर वृद्धि रुक जाएगी। उसे सामान्य रूप से पनपने का अवसर नहीं मिलेगा। ठीक इसी प्रकार बच्चों को ट्री गार्ड के समान नैतिक, धार्मिक व सामाजिक नियमों की सुरक्षा दो, पर उचित दूरी बनाकर। उन पर सद्व्यवहार के नियम थोपने नहीं हैं, उनका महत्त्व और न मानने से होने वाली लाभ-हानि के विषय में बोध कराना है। उन्हें स्वतन्त्र बनाओ, स्वछन्द नहीं।

ऐसा ट्री गार्ड उनके स्वस्थ विकास में सहायक होगा, बाधक नहीं।

माली का उद्देश्य केवल ट्री गार्ड लगाने से पूरा नहीं हो जाता। वह बीच-बीच में जब पौधे को खाद-पानी देने जाता है तो उसके विकास का निरीक्षण भी करता रहता है कि उसके आसपास कोई खरपतवार तो नहीं उग रही। जंगली घास के पाए जाने वाले एक तिनके को भी वह पनपने नहीं देता और उसी समय जड़ सहित उखाड़ कर फेंक देता है, चाहे इससे पौधे को कुछ कष्ट भी क्यों न उठाना पड़े। यदि एक बार उसने जड़ पकड़ ली तो वह अपने पौधे को उससे होने वाले नुकसान से नहीं बचा सकेगा।

ठीक इसी प्रकार माता-पिता के लिए अपने बच्चे की शिक्षा-दीक्षा, भोजन, स्वास्थ्य आदि के साथ-साथ उसके साथ रहने व पढ़ने वाले अन्य बच्चों का भी निरीक्षण करना आवश्यक है। यदि एक बार कोई बुरी आदत उसके जीवन में घर कर गई तो माता-पिता चाह कर भी उसे पतन के गड्ढे में गिरने से नहीं बचा सकेंगे। शुरू में हो सकता है कि बच्चे को अपने माता-पिता के इस व्यवहार से कष्ट का अनुभव हो, पर ऐसे खरपतवार को पनपने से पहले ही उसके जीवन से बाहर निकालना होगा। उस कार्य में समय का अभाव या बच्चे द्वारा विरोध करने का कोई बहाना नहीं चलेगा।

माली पौधे को कोई कष्ट नहीं देना चाहता, उसका उद्देश्य केवल उसको स्वस्थ रूप से विकसित करने का ही है। इसी प्रकार माता-पिता अपने बच्चों के कष्ट को नज़रअन्दाज़ करके उसे भली प्रकार समझाएं कि यह सब रोकटोक व अंकुश वे उसकी भलाई के लिए ही कर रहे हैं।

बच्चा भी पौधे के समान सामान्य रूप से विकसित होने लगेगा और धीरे-धीरे एक वृक्ष का आकार लेने लगेगा।

सबसे बड़ा प्रश्न तो अब खड़ा होगा कि उस ट्री गार्ड को पौधे के चारों ओर कब तक लगाना है? कुछ समय बाद माली देखता है कि अब पौधे का तना मज़बूत होने लगा है और उसकी जड़ें ज़मीन को अपने बल पर पकड़ कर वृक्ष को सीधा खड़ा रख सकती हैं। जड़ों की सहायता से वृक्ष बाहर से आने वाले आंधी-तूफान का सामना स्वयं कर लेगा, ऐसा विश्वास माली को होने लगता है, तो वह ट्री गार्ड को वहाँ से हटा लेता है। वह जान लेता है कि अब उसकी जड़ें विस्तार चाहती हैं। यदि अब भी ट्री गार्ड को न हटाया गया तो इसके विकास में बाधा उत्पन्न हो जाएगी और इसके बंधन में यह कसमसा कर रह जाएगा। अब यह निर्णय लेने का समय आ गया है कि मैं पौधे को अपने सहारे आगे बढ़ने के लिय स्वतन्त्र कर दूँ। इसी विश्वास के सहारे वह निश्चिन्त होकर उसका आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त कर देता है और ट्री गार्ड के बंधन से मुक्त कर देता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि वह अपनी पैनी निगाहों से पौधे का निरीक्षण करना बंद कर देगा। वह निरीक्षण तो करेगा, पर ऐसा कि उस पौधे को पता भी न चले और उसके सामने आने वाली समस्याएं भी माली को पता चलती रहें।

इसी प्रकार समझदार माता-पिता को अपनी परवरिश पर पूरा विश्वास होता है कि हमारा बच्चे में नैतिक, धार्मिक व सामाजिक सुसंस्कारों की जड़ें इतनी गहरी हो चुकी हैं कि वह अपने जीवन में आने वाली सब समस्याओं का समाधान करने में स्वयं सक्षम है। जो अच्छे संस्कार उसके मन में बीज के रूप में डाले गए थे, वे समय पाकर सद्गुणों के फल के रूप में परिवर्तित हो जाएंगे।

कहते हैं कि जब पिता के पैर का जूता बेटे के पैर में आने लगे और बेटी अपनी माँ की तरह अच्छे-बुरे की समझ रखने योग्य हो जाए तो उनसे मित्रवत् व्यवहार करना चाहिए। कई बार बच्चे भी अपने माता-पिता को उनकी समस्याओं का समाधान देने में समर्थ हो जाते हैं।

यदि बच्चे माता-पिता से सलाह मांगे, तो अपनी योग्यता व अनुभव के आधार पर समाधान दिया जा सकता है, पर अन्तिम निर्णय उन पर ही छोड़ देना चाहिए। सुसंस्कारों से युक्त संतान कभी अपने माता-पिता को किसी के सामने शर्मिन्दा नहीं होने देगी। हमें पूर्ण विश्वास है कि ऐसे बच्चे जगत में अपना नाम भी रोशन करेंगे और अपने माता-पिता को भी गर्व का अनुभव कराएंगे कि आप ऐसी संतान को पाकर संसार के बहुत भाग्यशाली व्यक्तियों में से एक हैं।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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