मेरे पति मेरे देवता (भाग - 24)

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मेरे पति मेरे देवता (भाग - 24)

श्री लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाएं

श्रीमती ललिता शास्त्री की ज़ुबानी

प्रस्तुतकर्ता - श्री उमाशंकर (जून, 1967)

सिपाही द्वारा चकमा

शास्त्री जी द्वारा लिखे दिन पर हम छोटी बीबी के साथ मलाका जेल पहुंची। जेल के फाटक पर एक दाढ़ी वाला सिपाही तैनात था। उसे हम देखते ही पहचान गई। पहले दिन जब कुर्की करने पुलिस वाले आए थे, तो वह भी उनके संग था। छोटी बीबी ने उससे शास्त्री जी के बारे में पूछा। पहले तो उसने बीबी की बातों पर ध्यान नहीं दिया। बाद में बोला - ‘अभी इन्तज़ार कीजिए। आने वाले हैं।’ हम दोनों फाटक से कुछ हट कर खड़ी हो गई।

दाढ़ी वाला सिपाही बार-बार हमें घूरता और मुस्कुराता जाता। फिर बगल में खड़े हुए सिपाही से हमें सुनाता हुआ बोला - ‘जानते हो, यह कौन है? यह है श्रीमती चन्द्रिका प्रसाद उर्फ श्रीमती लाल बहादुर। क्या समझे? कांग्रेसियों की औरतें भी बड़ी चालाक हुआ करती हैं। उस दिन बड़ा चकमा दिया था।’

खड़े-खड़े कुछ समय और बीता। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। इतने में एक सज्जन हम लोगों के पास आए और धीरे से बोले - ‘आप लोग लाल बहादुर के घर की हैं न!’

‘हाँ।’

‘फिर स्टेशन जाइए। यहाँ क्यों खड़ी हैं। आप लोगों के आने से पहले ही वे स्टेशन जा चुके हैं। उस सिपाही ने बदमाशी से आप लोगों को नहीं बताया है। मैं भी यहाँ का एक सिपाही हूँ।’

जल्दी-जल्दी सड़क पर आकर सवारी की और स्टेशन आए। कहीं शास्त्री जी की गाड़ी चली न गई हो। इस विचार से घबराहट भी बढ़ गई थी और अन्दर ही अन्दर रुलाई भी छूट रही थी।

स्टेशन के बाहर जेल वाली लॉरी बंद खड़ी थी। दूर से देख कर संतोष हुआ कि अभी शास्त्री जी यहीं हैं और यह भी भ्रम हुआ कि उसी लॉरी में बैठे हैं। हम लोग भी वहीं पास में खड़ी हो गई कि जब वे निकलेंगे, तब भेंट हो जाएगी। इसी बीच टण्डन जी आते हुए दिखलाई पड़े। हमें देखते ही उन्होंने पूछा - ‘बहू! भेंट हो गई?

‘अभी कहाँ?

‘तो यहाँ क्यों खड़ी हो? जल्दी से प्लेटफार्म पर चलो। गाड़ी छूटने वाली है।’

क्रमशः

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


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