मेरे पति मेरे देवता (भाग - 52)
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मेरे पति मेरे देवता (भाग - 52)
श्री लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाएं
श्रीमती ललिता शास्त्री की ज़ुबानी
प्रस्तुतकर्ता - श्री उमाशंकर (जून, 1967)
तिनके का सहारा
एक दिन अचानक 50 रुपए का मनीआर्डर आ गया। पंडित निष्कामेश्वर प्रसाद जी ने भेजा था। डूबते को जैसे तिनके का सहारा मिला हो। लेकिन जब दुःखों के दिन होते हैं, तब इस तरह के सहारे भी बेसहारों में बदल जाया करते हैं। श्री रामस्वरूप, जो इस समय लोक सभा के हरिजन सदस्य हैं, उस समय हमारे यहाँ मिर्ज़ापुर में रहा करते थे। इनके पिता ने जब इनकी पढ़ाई के लिए मज़बूरी जाहिर की थी, तब हमारे स्वर्गीय डिप्टी भैया (स्कूलों में डिप्टी होने के कारण वे घर में डिप्टी भैया के नाम से सम्बोधित होते थे) ने उन्हें अपने पास रख लिया था और लड़के जैसा प्यार देकर उन्हें पढ़ाते रहे थे।
उन दिनों रामस्वरूप इण्टर में थे और सालाना इम्तिहान की तैयारी कर रहे थे। उस दिन स्कूल से लौटते समय वे पकड़ लिए गए। उन्हें सरकार ने तोड़-फोड़ करने वालों का सहयोगी बता कर मुकद्दमा चलाया और 25 रुपए जुर्माना कर दिया। हमने उन्हीं 50 रुपयों में ये 25 रुपए उन के जुर्माने के भरे, वरना वे इम्तिहान में न बैठ पाते और पूरा साल ख़राब हो जाता। डिप्टी भैया तत्काल रुपयों का प्रबन्ध नहीं कर सके थे। इसलिए उन्हें रुपए हम दें, यह आवश्यक था। रामस्वरूप का इम्तिहान देना भी उतना ही ज़रूरी था।
हरि और कुसुम की तबीयत ठीक हो गई थी, पर हमारी तबीयत का वही हाल था। कुछ बिगड़ी ही थी, सुधरी नहीं थी। पहले के मुकाबले में मुँह से खून ज़्यादा गिरने लगा था। हर बार शास्त्री जी की चिट्ठी का जवाब लिख कर हम रामस्वरूप को दे दिया करती थी। रामस्वरूप उसे लिफ़ाफ़े में बंद करके डाक-बक्से में डाल आया करते थे। हमारी तबीयत का यह हाल देख कर हमारी छोटी भाभी ने एक दिन रामस्वरूप से चिट्ठी लेकर एक कोने में कुसुम से लिखवा दिया - ‘बाबू जी, अम्मा की तबीयत बहुत दिनों से ख़राब है। आप को लिखती नहीं हैं। उन के मुँह से खून गिरा करता है।’
दूसरे हफ़्ते जब शास्त्री जी की चिट्ठी आई, तब हमें सारी बातों की जानकारी हुई। शास्त्री जी ने अविलम्ब इलाहाबाद जाकर डॉक्टरों को दिखलाने के लिए लिखा था। उन्होंने रुपयों का भी प्रबन्ध कर दिया था, जो शीघ्र मिलने वाले थे। इलाहाबाद के राय अमरनाथ जी अपनी लड़की की शादी के सिलसिले में कुछ दिनों के लिए रुपए छोड़ गए थे। उन्हीं में से 250 रुपए हमारे पास आए थे।
क्रमशः
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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