मेरे पति मेरे देवता (भाग - 55)

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मेरे पति मेरे देवता (भाग - 55)

श्री लाल बहादुर शास्त्री के जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण घटनाएं

श्रीमती ललिता शास्त्री की ज़ुबानी

प्रस्तुतकर्ता - श्री उमाशंकर (जून, 1967)

वज़न बढ़ाने का उपाय

हमारी तबीयत सुधर तो रही थी, पर जिस हिसाब से सुधरनी चाहिए थी, उस तरह नहीं। शास्त्री जी हर चिट्ठी में हाल पूछते - ‘बुख़ार है कि नहीं और है तो कितना है! कितना घटा है और कितना बढ़ा है! खांसी आती है या नहीं।’ महीना समाप्त होने पर वज़न पूछते और उसे पिछले महीने के वज़न से मिला कर हमारी तन्दुरुस्ती की घटती-बढ़ती का अन्दाज़ लगाते।

उन्हें इतने से संतोष नहीं होता था। बीच-बीच में पूर्णिमा जी से भी जानकारी कर लिया करते थे, क्योंकि वे समझते थे कि तबीयत ठीक न होने पर भी हम उन्हें ठीक लिख सकती थी। हमारी बीमारी को लेकर जिस तरह वे चिन्तित रहने लगे थे, उससे हमारी उलझन बढ़ गई थी। हम उन्हें सारी चिन्ताओं से बरी रख कर प्रसन्नचित्त रखना चाहती थी, लेकिन हो रहा था एकदम उसके उलट।

बुख़ार व खांसी तो वैसे भी ख़त्म हो गई थी, पर जहाँ तक वज़न का सवाल था, वह नहीं बढ़ पा रहा था और वज़न न बढ़ने का मतलब था - रोग़ से छुटकारा न मिलना। चूँकि वज़न डॉक्टर स्वयं लेते थे, इसलिए उसमें हमारा कोई दाँव-पेच नहीं चल पा रहा था। हम किसी तरह शास्त्री जी को अपनी बीमारी की चिन्ता से मुक्ति दिलाना चाहती थी। हम उपाय सोचने लगी और सौभाग्य से एक उपाय सूझ भी गया।

अगले महीने वज़न के लिए जब हम डॉक्टर साहब के पास जाने लगी, तब धोती के नीचे करधनी पहन ली। वज़न बढ़ गया। डॉक्टर साहब को ख़ुशी हुई। दूसरे दिन शास्त्री जी को वज़न लिख कर भेज दिया। शास्त्री जी का उत्तर आया - वे अत्यधिक प्रसन्न हैं। हम भी अपनी तरकीब पर प्रसन्न थी। लेकिन हमारी इस तरकीब का भी भंडाफोड़ हो गया।

जल्दी-जल्दी में एक महीने हम करधनी पहन कर जाना भूल गई। वज़न घट गया। डॉक्टर साहब चिन्ता में पड़ गए। बढ़ कर अकारण घट जाना, यह कुछ अजीब-सी बात थी। उन की चिंता दूर करने के लिए हम ने उनसे न कह कर पूर्णिमा जी को वास्तविकता बतला दी। पूर्णिमा जी ने डॉक्टर साहब को और शास्त्री जी को सूचित कर दिया।

हम समझती हैं कि कोई काम तब तक नहीं होता, जब तक उसका समय नहीं आ जाता। जितने दिनों तक, जिसे जो भोगना है, उसे भोगना ही पड़ेगा। हमारी तबीयत अब ठीक होने लगी थी। इसी बीच शास्त्री जी की चिट्ठी में जो सूचना मिली, वह ऐसी थी, जिस की ख़ुशी का वर्णन हम आज दिन भी नहीं कर पाती हैं।

कोई 2 बरस बाद उन्हें देखने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा था। इतने समय बाद सरकार ने मिलाई की अनुमति दी थी। हमने झटपट दरख़्वास्त लगाई। वह मंजूर हुई। दी हुई तारीख़ पर हम बच्चों को लेकर नैनी जेल पहुँची। जेलर साहब ने कृपा करके हमारे लिए फाटक के बाहर पेड़ के नीचे चारपाई बिछवा दी थी। उन्हें हमारी बीमारी का हाल शायद मालूम था। थोड़ी देर बाद शास्त्री जी सिर पर तौलिया डाले बाहर निकले। वे इतने दुर्बल हो गए थे कि पहले हम पहचान ही नहीं सकी थी। जब कुसुम ने कहा - अम्मा! बाबूजी आ रहे हैं, तब हम पहचान सकी और उठ कर खड़ी हो गई। हमारे हाथ जुड़ गए और अनायास आँखों से आँसू बह चले।

क्रमशः

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


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