प्रभु की दुकान

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प्रभु की दुकान

Image by Dennis Mbaria from Pixabay

एक दिन मैं सड़क पर जा रहा था। रास्ते में एक जगह बोर्ड लगा था ‘ईश्वरीय किरयाने की दुकान’।

मेरी जिज्ञासा बढ़ गई। क्यों न इस दुकान पर जाकर देखें कि इसमें बिकता क्या है?

जैसे ही यह ख्याल आया, दरवाज़ा अपने आप खुल गया। मैंने खुद को दुकान के अंदर पाया।

ज़रा-सी जिज्ञासा रखते हैं तो द्वार अपने आप खुल जाते हैं। खोलने नहीं पड़ते।

मैंने दुकान के अंदर देखा - जगह-जगह देवदूत खड़े थे। एक देवदूत ने मुझे टोकरी देते हुए कहा - मेरे बच्चे! ध्यान से खरीदारी करो।

वहाँ वह सब कुछ था जो एक इंसान को ख़ुशहाल ज़िदगी जीने के लिए आवश्यक था। देवदूत ने कहा - एक बार में टोकरी भर कर न ले जा सको, तो दोबारा आ जाना। फिर दोबारा टोकरी भर लेना।

अब मैंने सारी चीजें देखनी आरम्भ की। सबसे पहले ‘धीरज’ खरीदा, फिर ‘प्रेम’ भी ले लिया। फिर ‘समझ’ ले ली। फिर एक-दो डिब्बे ‘विवेक’ के भी ले लिए।

आगे जाकर ‘विश्वास’ के दो-तीन डिब्बे उठा लिए और मेरी टोकरी भरती गई।

आगे गया तो ‘पवित्रता’ मिली। सोचा कि इसको कैसे छोड़ सकता हूँ?

फिर ‘शक्ति’ का साइनबोर्ड आया। शक्ति भी ले ली। ‘हिम्मत’ भी ले ली। सोचा कि हिम्मत के बिना केवल शक्ति से तो जीवन में काम ही नहीं चलता।

आगे चला तो ‘सहनशीलता’ ली। फिर ‘मुक्ति’ का छोटा-सा डिब्बा भी ले लिया।

मैंने वे सब चीजें खरीद ली जो मेरे मालिक (भगवान) को पसंद हैं।

फिर जिज्ञासु की नज़र ‘प्रार्थना’ पर पड़ी। मैंने उसका भी एक डिब्बा उठा लिया। यह सोच कर कि सब गुण होते हुए भी अगर मुझसे कभी कोई भूल हो जाए तो मैं प्रभु से प्रार्थना कर लूंगा कि मुझे भगवान माफ़ कर देना।

आनंद व शांति गीतों से मैंने बॉस्केट को भर लिया। फिर मैं काउंटर पर गया और देवदूत से पूछा - सर! मुझे इन सब सामान का कितना बिल चुकाना है?

देवदूत बोला - मेरे बच्चे! यहां के बिल को चुकाने का ढंग भी ईश्ववरीय है।

अब तुम जहां भी जाना, इन चीजों को भरपूर बांटना और लुटाना। इन चीजों का बिल इसी तरह चुकाया जाता है।

जानते हो! कोई-कोई विरला ही इस दुकान पर प्रवेश करता है और जो प्रवेश कर लेता है, वह मालामाल हो जाता है। वह इन गुणों को खूब भोगता भी है और लुटाता भी है।

प्रभु की यह दुकान सतगुरु के सत्संग की दुकान है।

सतगुरु की शरण में आकर जब हम उसके वचनों से प्रीत करते हैं तो सब गुणों के ख़ज़ाने हमको मिल जाते हैं। फिर कभी खाली हो भी जाए, तो फिर सत्संग में आ कर बास्केट भर लेना।

यही भगवान के प्रति सच्चा प्रेम और सच्ची श्रद्धा है, जो जीवन को ख़ुशहाल बनाती है।

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सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

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