परछाई
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परछाई
(एक बोध कथा)
एक रानी नहाकर अपने महल की छत पर बाल सुखाने के लिए गई। उसके गले में एक हीरों का हार था। जिसे उतार कर रानी ने वहीं आले पर रख दिया और बाल संवारने लगी।
इतने में एक कौवा आया। उसने देखा कि कोई चमकीली चीज़ है, तो उसे लेकर वह उड़ गया। एक पेड़ पर बैठ कर उसे खाने की कोशिश की, पर खा न सका। कठोर हीरों पर मारते-मारते उसकी चोंच दुखने लगी। अंततः हार को उसी पेड़ पर लटकता छोड़ कर वह उड़ गया।
जब रानी के बाल सूख गए तो उसका ध्यान अपने हार पर गया, पर वह तो वहाँ था ही नहीं। इधर-उधर ढूंढा, परन्तु हार गायब। रोती-धोती वह राजा के पास पहुंची और बोली कि मेरे हार की चोरी हो गई है। उसका पता लगाइए।
राजा ने कहा - चिंता क्यों करती हो, दूसरा बनवा देंगे।
लेकिन रानी मानी नहीं। उसे उसी हार की रट थी। कहने लगी - नहीं, मुझे तो वही हार चाहिए। अब सब ढूंढने लगे, पर किसी को हार मिला ही नहीं।
राजा ने कोतवाल को कहा - मुझ को वह गायब हुआ हार लाकर दो। कोतवाल बहुत परेशान हुआ। कहाँ मिलेगा? सिपाही, प्रजा, कोतवाल - सब हार खोजने में लग गए।
राजा ने ऐलान किया - जो कोई रानी का हार लाकर मुझे देगा, उसको मैं आधा राज्य पुरस्कार में दे दूंगा।
अब तो होड़ लग गई प्रजा में। सभी लोग हार ढूंढने लगे आधा राज्य पाने के लालच में।
ढूंढते-ढूंढते अचानक वह हार किसी को एक गंदे नाले में दिखा। हार तो दिखाई दे रहा था, पर नाले में से बदबू आ रही थी। काला पानी बहता हुआ दिखाई दे रहा था, परन्तु एक सिपाही उसमें कूदा। इधर-उधर बहुत हाथ मारा, पर कुछ नहीं मिला। पता नहीं हार कहाँ गायब हो गया। फिर कोतवाल ने देखा, तो वह भी कूद गया। दो को कूदते देखा तो कुछ उत्साही प्रजाजन भी कूद गए। फिर मंत्री कूदा। तो इस तरह उस नाले में भीड़ लग गई, ईनाम का लालच जो था।
लोग आते रहे और अपने कपड़े निकाल-निकाल कर कूदते रहे। लेकिन हार मिला किसी को नहीं। पहले तो हार दिखाई देने लगता, पर कोई भी कूदता तो वह गायब हो जाता। जब कुछ नहीं मिलता, तो वह निकल कर दूसरी तरफ खड़ा हो जाता। सारे शरीर पर बदबूदार गंदगी लगी है, सब काले पानी में भीगे हुए खड़े हैं।
दूसरी ओर दूसरा तमाशा। बड़े-बड़े जाने-माने ज्ञानी, मंत्री सब में होड़ लगी है। मैं जाऊंगा पहले, नहीं मैं तेरा वरिष्ठ अधिकारी हूँ, मैं जाऊंगा पहले हार लाने के लिए।
इतने में राजा को खबर लगी। उसने सोचा कि क्यों न मैं ही कूद जाऊँ उसमें? आधे राज्य से हाथ तो नहीं धोना पड़ेगा, तो राजा भी कूद गया।
इतने में एक संत गुज़रे उधर से। उन्होंने यह तमाशा देखा तो वे हंसने लगे। यह क्या तमाशा है? राजा, प्रजा, मंत्री, सिपाही - सब कीचड़ में लथपथ।
उन्होंने पूछा कि क्यों कूद रहे हो इसमें?
लोगों ने कहा - महाराज! बात यह है कि रानी का हार चोरी हो गया है। वहाँ नाले में दिखाई दे रहा है। लेकिन पता नहीं क्या बात है कि जैसे ही लोग कूदते हैं तो वह गायब हो जाता है। किसी के हाथ नहीं आता।
संत हंसने लगे - भाई! किसी ने ऊपर भी देखा है? ऊपर देखो। वह टहनी पर लटका हुआ है। नीचे जो तुम देख रहे हो, वह तो उसकी परछाई है।
सब यह देख कर हैरान हो गए। वस्तु है कहीं और व हम खोज कहीं और रहे हैं।
इस कहानी का क्या मतलब हुआ?
जिस चीज की हमको जरूरत है, जिस परमात्मा को हम पाना चाहते हैं, जिसके लिए हमारा हृदय व्याकुल होता है - वह सुख, शांति और आनन्द रूपी हार क्षणिक सुखों के रूप में परछाई की तरह दिखाई देता है और यह महसूस होता है कि इस को हम प्राप्त कर लेंगे। अगर हमारी यह इच्छा पूरी हो जाएगी तो हमें शांति मिल जाएगी। हम सुखी हो जाएंगे। परन्तु जब हम उसे पाने के लिए उसमें कूदते हैं, तो वह सुख और शांति न जाने कहाँ विलीन हो जाती है और हमें प्राप्त नहीं हो पाती।
इसलिए सभी संत-महात्मा हमें यही संदेश देते हैं कि वह शांति, सुख और आनन्द रूपी हीरों का हार, जिसे हम संसार में परछाई की तरह पाने की कोशिश कर रहे हैं, वह हमारे अंदर ही खोजने पर मिलेगा, बाहर नहीं।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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