राजा और अतिथि की पगड़ी
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राजा और अतिथि की पगड़ी
Image by 👀 Mabel Amber, who will one day from Pixabay
एक राजा ने दरबार में सुबह-सुबह दरबारियों को बुलाया। उसका दरबार भरता ही जा रहा था कि एक अजनबी यात्री वहाँ आया। वह किसी दूर देश का रहने वाला होगा। उसके वस्त्र पहचाने हुए से नहीं मालूम पड़ते थे। उसकी शक्ल भी अपरिचित थी, लेकिन वह बहुत गरिमाशाली और गौरवशाली व्यक्तित्व का धनी मालूम होता था। सारे दरबार के लोग उसकी तरफ़ देखते ही रह गए।
उसने एक बहुत शानदार पगड़ी पहन रखी थी। वैसी पगड़ी उस देश में कभी नहीं देखी गयी थी। वह बहुत रंग-बिरंगी छापेदार थी। ऊपर चमकदार चीजें लगी थी।
राजा ने पूछा - अतिथि! क्या मैं पूछ सकता हूँ कि यह पगड़ी कितनी मंहगी है और कहाँ से खरीदी गयी है?
उस आदमी ने कहा - यह बहुत मंहगी पगड़ी है। इसके लिए मुझे एक हजार स्वर्ण मुद्रा खर्च करनी पड़ी हैं।
वज़ीर राजा की बगल में बैठा था और वजीर स्वभावतः चतुर व चालाक होते हैं, नहीं तो उन्हें कौन वजीर बनाएगा? उसने राजा के कान में कहा - सावधान! यह पगड़ी बीस-पच्चीस रुपये से ज्यादा की नहीं मालूम पड़ती। यह इसका मूल्य हज़ार स्वर्ण मुद्रा बता रहा है। इसका आपको लूटने का इरादा है।
उस अतिथि ने भी उस वज़ीर को, जो राजा के कान में कुछ कह रहा था, उसके चेहरे से पहचान लिया। वह अतिथि भी कोई नौसिखिया नहीं था। उसने भी बहुत दरबार देखे थे और बहुत दरबारों में वज़ीर और राजा देखे थे।
वज़ीर ने जैसे ही अपना मुँह राजा के कान से हटाया वह नवागंतुक बोला - फिर क्या मैं लौट जाऊँ? मुझे कहा गया था कि इस पगड़ी को खरीदने वाला सारी जमीन पर एक ही सम्राट् है, एक ही राजा है। क्या मैं लौट जाऊँ इस दरबार से और मैं समझूँ कि यह दरबार वह दरबार नहीं है जिसकी मैं खोज में हूँ? मैं कहीं और जाऊँ क्या? मै बहुत से दरबारों से वापस आया हूँ। मुझे कहा गया है कि एक ही राजा है इस ज़मीन पर, जो इस पगड़ी को एक हजार स्वर्ण मुद्राओं में खरीद सकता है। तो क्या मैं लौट जाऊँ? क्या यह दरबार वह दरबार नहीं है?
राजा ने कहा - मंत्री! इसे दो हजार स्वर्ण मुद्राएं दो और पगड़ी खरीद लो। वज़ीर बहुत हैरान हुआ। जब वजीर चलने लगा तो उस आए हुए अतिथि ने वजीर के कान में कहा - मित्र! “You may be knowing the price of the turban, but I know the weakness of the king.” (तुम जानते हो कि पगड़ी के दाम कितने हैं, लेकिन मैं राजाओं की कमजोरियां जानता हूँ।)
इस संसार में तान्त्रिक-मान्त्रिक ईश्वर के वास्तविक गुणों को तो नहीं जानते, लेकिन आदमी की कमज़ोरियों को जानते हैं और यही इनसे खतरा है। आज उन्हीं कमज़ोरियों का शोषण चल रहा है। आदमी बहुत कमज़ोर है और उसमें बहुत कमजोरियाँ हैं। आज उसकी उन्हीं कमजोरियों का लाभ उठाया जा रहा है।
स्मरण रखें - जो परमात्मा की शक्ति को जानता है, उसके लिए ज़मीन पर कोई कमज़ोरी नहीं रह जाती और जो परमात्मा को पहचानता है, उसका कहा मानता है, उस का शोषण असंभव है।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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