सुखी जीवन का रहस्य
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सुखी जीवन का रहस्य
Image by 👀 Mabel Amber, who will one day from Pixabay
एक महान संत हुआ करते थे, जो अपना स्वयं का आश्रम बनाना चाहते थे। जिसके लिए वे कई लोगों से मुलाकात करते थे। उन्हें एक जगह से दूसरी जगह यात्रा के लिए जाना पड़ता था। इसी यात्रा के दौरान उनकी मुलाकात एक साधारण-सी विदुषी कन्या से हुई। विदुषी ने उनका स्वागत किया और संत से कुछ समय कुटिया में रुक कर आराम करने की याचना की। रात्रि का समय था। संत उसके मीठे व्यवहार से प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका आग्रह स्वीकार किया।
विदुषी ने संत को अपने हाथों से बनाया हुआ स्वादिष्ट भोजन कराया और उनके विश्राम के लिए खटिया पर एक दरी बिछा दी और खुद फर्श पर टाट बिछा कर सो गई। विदुषी को लेटते ही नींद आ गई। उसके चेहरे के भाव से पता चल रहा था कि विदुषी चैन की सुखद नींद ले रही है। उधर संत को खाट पर नींद नहीं आ रही थी। उन्हें मोटे नरम गद्दे की आदत थी, जो उन्हें दान में मिला था। वे रात भर विदुषी के बारे में सोच रहे थे कि वह कैसे इस कठोर जमीन पर इतने चैन से सो रही है।
दूसरे दिन सवेरा होते ही संत ने विदुषी से पूछा कि तुम कैसे इस कठोर धरा पर इतने चैन से सो रही थी? तब उसने बड़ी सरलता से उत्तर दिया - हे गुरुदेव! मेरे लिए मेरी ये छोटी-सी कुटिया एक महल के समान ही भव्य है। इसमें मेरे श्रम की महक है। अगर मुझे एक समय भी भोजन मिलता है तो मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूँ। जब दिन भर के कार्यों के बाद मैं इस धरा पर सोती हूँ तो मुझे माँ की गोद का आत्मीय अहसास होता है। मैं दिन भर के अपने सत्कर्मों का विचार करते हुए चैन की नींद सो जाती हूँ। मुझे अहसास भी नहीं होता कि मैं इस कठोर धरा पर हूँ।
यह सब सुनकर संत जाने लगे। तब विदुषी ने पूछा - हे गुरुवर! क्या मैं भी आपके साथ आश्रम के लिए धन एकत्र करने चल सकती हूँ? तब संत ने विनम्रता से उत्तर दिया - बालिका! तुमने जो मुझे आज ज्ञान दिया है, उससे मुझे पता चला कि चित्त का सुख कहाँ है। अब मुझे किसी आश्रम की इच्छा नहीं रह गई।
यह कहकर संत वापस अपने देश लौट गये और एकत्रित किया धन उन्होंने गरीबों में बाँट दिया और स्वयं एक कुटिया बनाकर रहने लगे।
शिक्षा -
आत्म-शांति एवं संतोष ही सुखी जीवन का रहस्य है। जब तक इंसान को संतोष नहीं मिलता, वह जीवन की मोह-माया में फंसा ही रहता है और जो इस मोह-माया में फँसता है, उसे कभी चैन नहीं मिलता।
जीवन का सुख संतोष वृत्ति में है। अगर मनुष्य जो उसके पास है, उसे स्वीकार कर ले और उसी में खुशियाँ तलाशे, तो वह उसी क्षण सारे सुख का अनुभव कर लेता है। जिस तरह विदुषी एक वक्त के भोजन को ही अपना सौभाग्य मानती है और कठोर धरा पर भी चैन से सोती है। उसी कारण उसे जीवन में सभी सुखों का अनुभव हुआ है। वहीं एक संत वैरागी होते हुए भी, खाट पर चैन से नहीं सो पा रहा था क्योंकि उसे अपने पास जो है, उससे संतोष नहीं था। जिस दिन उसने यह सत्य स्वीकार लिया, उसे एक कुटिया में भी अपार शांति का अनुभव होने लगा।
यह कथा सुखी जीवन का रहस्य कहती है। आज घर में अपार धन, दौलत, ऐशो आराम होते हुए भी लोग सुख-शांति से नहीं रह पाते क्योंकि उन्हें जो प्राप्त है, उसमें संतोष नहीं मिलता। कहते हैं न कि जिन्हें दूसरों की थाली में घी ज्यादा दिखता है, वह कभी अपनी थाली के घी का स्वाद नहीं ले पाता और खुद चैन से नहीं रहता। व्यक्ति को हमेशा वह चाहिये, जो उसके पास नहीं है और उसका चाहा मिल भी जाए तो नई महत्वाकांक्षा उसकी जगह ले लेती है। इस तरह पूरा जीवन असंतोष में ही बीत जाता है और उसे अंत समय में भी चैन नहीं मिलता।
अतः संतुष्टि ही जीवन का मूल मंत्र है। अगर इंसान में संतोष है, तो कोई दुःख उसे तोड़ नहीं सकता। यही है - सुखी जीवन का रहस्य।
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सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
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