master of destiny
तुम अपने भाग्य के स्वामी स्वयं हो
You are master of your destiny.
जो लोग विपत्ति का सामना करते समय अपने भाग्य को कोसना शुरू कर देते हैं, वे कृपया याद रखें कि तुम अपने जीवन में जो भी हो, उस के जिम्मेदार शत-प्रतिशत तुम ही हो। तुमने अपना भाग्य अपने हाथों से बनाया है। तुम्हारे भूतकाल ने तुम्हारा वर्तमान बनाया है और तुम्हारा वर्तमान तुम्हारा भविष्य बनाएगा। जो तुमने पहले किया है, उसी का फल तुम्हें आज मिल रहा है। यदि तुम अपने वर्तमान को सावधानी से अपने अधीन रखते हो तो भविष्य अभी भी तुम्हारे हाथ में है। इसलिए विपत्तियों के लिए भाग्य को मत कोसो, बल्कि वास्तविकता का साहस से सामना करो। जीवन के प्रति उत्तरदायित्व को स्वीकार करो और अनुभव करो कि तुम्हारे विचार, शब्द और क्रियाएं ही तुम्हारा भविष्य बनाती हैं और जीवन के प्रति तुम्हारे दृष्टिकोण में बड़ा परिवर्तन ला सकती हैं।
तुम अपने अन्दर छिपी बड़ी शक्ति के द्वारा अपने वर्तमान भाग्य को बदल भी सकते हो और सुधार भी सकते हो। तुम्हें भाग्य के हाथों असहाय दास बनने की आवष्यकता नहीं है। विभिन्न बाधाओं के विरुद्ध सकारात्मक सोच का अभ्यास करके और दृढ़ इच्छा-शक्ति और निश्चय के साथ प्रयास करके तुम भाग्य के दुष्प्रभाव को निरस्त कर सकते हो।
यदि तुम भगवान के सामने शरणागत हो जाओ, तो भाग्य के चक्र से बाहर निकलना आसान हो जाएगा, क्योंकि तुम्हें हर कदम पर ईश्वरीय सहायता भी मिलेगी।
एक छोटे से गाँव में दो दोस्त रहते थे, रामू और श्याम। रामू हमेशा शिकायत करता रहता कि “मेरा भाग्य ही ख़राब है, मुझे कभी कुछ नहीं मिलता।” जब उसकी फ़सल ख़राब होती, तो वह कहता, “यह मेरा भाग्य है।” वहीं श्याम, जो उतना ही ग़रीब था, हर सुबह उठकर अपने खेतों में कड़ी मेहनत करता। वह कभी शिकायत नहीं करता, बल्कि हर मुश्किल का सामना करता।
एक दिन रामू ने श्याम से पूछा, “श्याम, तुम इतने ख़ुश और सफ़ल कैसे रहते हो? मेरा तो भाग्य ही ख़राब है, मुझे कभी अच्छी फ़सल नहीं मिलती।”
श्याम मुस्कुराया और बोला, “रामू, तुम भाग्य को दोष देते हो, लेकिन मैं कर्म पर विश्वास करता हूँ। ईश्वर ने हमें हाथ-पैर दिए हैं, ताकि हम अपना रास्ता खुद बनाएँ। भाग्य कोई लिखी हुई चीज़ नहीं, बल्कि हमारे हर दिन के कर्मों का नतीजा है।”
श्याम ने अपनी बात साबित करने के लिए कहा, “आज मैं तुम्हें दिखाता हूँ।” श्याम अपने खेत में गया और कुछ बीज बोए, फिर रामू को अपने साथ ले गया। श्याम ने रामू से कहा, “तुम बस देखते रहो।” श्याम ने अपने खेत में पानी दिया, खरपतवार निकाले, और कड़ी मेहनत की।
अगले कुछ महीनों तक श्याम ने अपने खेत में जी-जान लगा दी। रामू भी, जो पहले भाग्य को कोसता था, श्याम को देखकर प्रेरित हुआ। उसने भी अपने खेत में मेहनत करनी शुरू कर दी।
जब फसल कटने का समय आया, श्याम का खेत लहलहा रहा था, जबकि रामू का खेत भी पहले से काफी बेहतर था।
श्याम ने रामू से कहा, “देखा रामू, जब हम मेहनत करते हैं, तो भाग्य भी हमारा साथ देता है। जब हम कर्म करते हैं, तो हम अपना भाग्य खुद बनाते हैं। आज तुम्हारा भाग्य इसलिए अच्छा हुआ, क्योंकि तुमने कर्म करना सीख लिया।”
रामू को अपनी गलती समझ आई। उसने श्याम का धन्यवाद किया और खुद भी एक मेहनती किसान बन गया।
नैतिक शिक्षाः मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं होता है। आलस्य और भाग्य पर निर्भरता से कुछ हासिल नहीं होता, बल्कि कर्म और पुरुषार्थ से ही सफलता मिलती है। मनुष्य अपना भाग्य निर्माता स्वयं है, इसलिए नाव पर बैठे हुय दास के समान तुम्हें भाग्य के चक्र में अन्तहीन घूमने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हारे अन्दर इस चक्र से बाहर निकलने की शक्ति है और इसके द्वारा नियंत्रित होने की बजाय इस पर नियंत्रण करने की ताकत है। जैसे-जैसे तुम्हारी चेतना के स्तर का विकास होगा, तुम पर कर्मों का बन्धन ढीला होता जाएगा। यही कारण है कि आध्यात्मिक प्रकाश से युक्त मनुष्य किसी प्रकार की विपत्ति से नहीं डरते। वे उस स्तर पर होते हैं, जहां वे अन्य वस्तुओं द्वारा चलायमान नहीं होते, बल्कि वे खुद उनको गति देते हैं। भाग्य के चक्र का हत्था उनके हाथ में होता है, जिसके द्वारा वे स्थिर अवस्थाओं को भी बदल देते हैं। भाग्य उनके लिए दास का काम करता है, न कि हम सब की तरह, जहां
भाग्य मालिक की तरह काम करता है और हम उसके दास की तरह बन कर रहते हैं।
इसका एक दूसरा आयाम भी है। एक बार तुम अपनी चेतना और मानसिक नियंत्रण के उच्च स्तर को प्राप्त कर लेते हो, तो तुम पर विपरीत परिस्थितियों का प्रभाव नहीं पड़ेगा। तुम्हारा जीवन की विपरीतताओं को देखने का और प्रतिक्रिया करने का ढंग पूरी तरह बदल जायगा। तुम उन्हें गंभीरता से नहीं लोगे और उन पर प्रश्न-चिह्न नहीं लगाओगे। तुम अनुभव करोगे कि वे समस्याएं किसी नियम के मुताबिक आई हैं और कुछ समय बाद अदृश्य हो जायंगी। इस प्रकार तुम अपने आप को अलग ;कमजंबीद्ध रख कर इन कठिनाइयों को एक दर्शक की तरह देखते हुय मानसिक रूप से स्थिर रह सकते हो। यह केवल मन ही है जहां तुम सभी तरह के दर्द, निराशाएं, चिन्ताएं, उत्सुकताएं, डर आदि महसूस करते हो। निःस्पृह भाव से देखने पर ये सब परिस्थितियां तुम पर हावी होना छोड़ देंगी और तुम्हारे चरणों में गिर पड़ेंगी।
सरिता जैन
सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका
हिसार
🙏🙏🙏
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