Enjoy your work

 काम का आनन्द लो, फल की चिन्ता न करो।
Enjoy your work, don't worry about the fruits.

जो काम तुम कर रहे हो उसमें आनन्द लेना सीखो, क्यांकि फल तुम्हारे हाथ में नहीं है और वह केवल भगवान के हाथ में है। तुम्हें अपनी ख़ुशी के लिए फल पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। मान लो तुम कहते हो कि तुमने कठिन परिश्रम किया था, लेकिन फिर भी तुम्हें अब तक फल नहीं मिला। तुम अपना दिमाग़ इस विश्लेषण में क्यों लगाना चाहते हो? इसका विश्लेषण करना भगवान का काम है। 

एक शहर में एक गरीब रिक्शा चालक था, रामू। उसका जीवन हर रोज़ कमाने और खाने में बीतता था। उसके पास न धन था, न सुविधाएँ, लेकिन उसका मन शांत रहता था। वह अपने काम को बोझ नहीं, बल्कि अपनी ज़िम्मेदारी समझता था।

एक दिन, बहुत मेहनत के बाद, रामू ने पाँच रुपये बचाए। यह उसके लिए एक बड़ी उपलब्धि थी। उसने घर जाकर अपनी पत्नी को वे पैसे दिए और कहा, “यह हमारी मेहनत के बचे हुए पैसे हैं, इन्हें संभाल कर रखना, यह कभी काम आएँगे।“ उस दिन रामू के चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह किसी अमीर के चेहरे पर भी मुश्किल से मिलती थी।

उसी शहर में एक और व्यक्ति था, मोहन; जो एक बड़े दफ्तर में काम करता था। उसके पास सब कुछ था, पर वह हमेशा तनाव में रहता था। उसे लगता था कि उसका काम नीरस है और उसे कोई खुशी नहीं मिलती।

एक दिन मोहन ने रामू को देखा। रामू अपने रिक्शे की सफाई कर रहा था और गुनगुना रहा था। मोहन ने पूछा, “रामू! तुम्हारे पास कुछ नहीं है, फिर भी तुम इतने खुश कैसे रहते हो?“

रामू मुस्कुराया और बोला, “मोहन भाई! आनंद तो ’तितलियों’ में है। जब मैं सुबह रिक्शा लेकर निकलता हूँ, तो मैं सोचता हूँ कि आज किसी की मदद करूँगा, किसी को समय पर पहुँचाऊँगा, और जब मैं ऐसा करता हूँ, तो मुझे खुशी मिलती है। ये ख़ुशी ही मेरी  ’तितलियाँ’ हैं।

जैसे आज, मैंने इस बूढ़ी अम्मा को मंदिर पहुँचाया और उन्होंने मुझे आशीर्वाद दिया, वही मेरे लिए आनंद है। जब मैं दिन के अंत में कुछ पैसे बचाता हूँ, तो वह मेरी मेहनत का फल होता है, और मैं उसे देखकर खुश होता हूँ। आनंद कहीं बाहर नहीं, हमारे अंदर और हमारे काम करने के तरीके में है।“

मोहन को रामू की बात समझ आई। उसने महसूस किया कि वह अपनी ’तितलियों’ को नज़रअंदाज़ कर रहा था और सिर्फ़ ’बोझ’ ढो रहा था। उस दिन से, मोहन ने अपने काम में उद्देश्य ढूँढना शुरू किया और छोटे-छोटे अच्छे पलों को महसूस करने लगा, जिससे उसका काम भी आनंदपूर्ण बन गया।

सीखः काम का आनंद बाहरी परिस्थितियों पर नहीं, बल्कि हमारे दृष्टिकोण और उद्देश्य पर निर्भर करता है; छोटे-छोटे संतोषजनक क्षणों को महसूस करने और अपनी ज़िम्मेदारियों को प्रेम से निभाने से ही जीवन में सच्चा आनंद मिलता है।

यह कई बातों पर निर्भर करता है कि भगवान तुम्हें इसका फल कब देगा। शायद इसी जन्म में या अगले जन्म में। तुमने अपना कर्क्राव्य कर दिया है और तुम्हारा काम समाप्त हो गया है। अब तुम अपने अगले काम की तरफ चलो। जो काम भगवान को करना है उसमें दख़ल क्यों देते हो?

सरिता जैन

सेवानिवृत्त हिन्दी प्राध्यापिका

हिसार

🙏🙏🙏


विनम्र निवेदन

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धन्यवाद। 


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